एन. रघुरामन का कॉलम: कम से कम मदर्स डे पर तो मां के ‘निर्णय लेने के बोझ’ को कम कीजिए


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9 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

‘बेटा, गुड़िया का बाथरूम इस्तेमाल मत करो। तुम उसे गंदा छोड़ देते हो और उसे यह अच्छा नहीं लगता,’ मां रसोई से आवाज लगाकर कहती हैं, फिर भी बेटा वही वॉशरूम इस्तेमाल करता है। दो अलग-अलग आकार की सैंडविच बनाते हुए- क्योंकि गुड़िया को चार टुकड़ों में कटा सैंडविच पसंद है, जबकि बेटे को त्रिकोण आकार वाला- वे जल्दी से गुड़िया के बाथरूम में जाकर यह सुनिश्चित भी करती हैं कि वह सूखा हो। ऐसा करते हुए वे बड़बड़ाती हैं, “यह लड़का तो कभी मेरी सुनता ही नहीं।

इसे समझ नहीं आता कि गुड़िया अब बड़ी हो गई है और उसे अपनी प्राइवेसी चाहिए।’ आज घर में कौन क्या खाएगा, बेटी को आज क्लास में क्या पहनकर जाना चाहिए, कितने बजे घर से निकलना चाहिए ताकि देरी न हो, परिवार के हर सदस्य की वह कौन-सी समस्या है जिसे उनके बाहर निकलने से पहले सुलझाना जरूरी है, पालतू जानवरों को कब घुमाने ले जाना है, मेड के आने पर उसे क्या निर्देश देने हैं- इन तमाम फैसलों के साथ ही वे पति का वालेट देखकर यह भी चेक करती हैं कि उसमें रुपए हैं या नहीं, क्योंकि वे हमेशा यह कहकर उसे खाली छोड़ देते हैं कि अब हर जगह ऑनलाइन भुगतान हो जाता है, और फिर किसी छोटी-सी वजह से कैश के अभाव में उलझ जाते हैं।

वे पूरा दिन फैसले लेते हुए बिताती हैं- छोटे फैसले, बड़े फैसले, लगातार फैसले, यहां तक कि वे फैसले भी जो किसी को दिखाई तक नहीं देते। घर-परिवार नाम की मशीनरी को चलाने का मानसिक बोझ कोई छोटा काम नहीं है। मातृत्व हमेशा से थकान और त्याग की ऐसी कहानी रहा है, जिसे निभाया तो जाता है, पर जिसके बारे में बोला नहीं जाता। उनका गुस्सा भी हमेशा क्षणिक होता है। जब बेटी पीछे से आकर उन्हें गले लगाती है और कहती है, “मां, आई लव यू,’ तब किसी को समझ नहीं आता कि कुछ मिनट पहले पूरे घर पर बरस रहा उनका गुस्सा अचानक कहां पिघल गया। वे भी उसे हल्के से गले लगाते हुए एक सांस में कहती हैं, “अच्छा, अच्छा, मैं भी तुमसे प्यार करती हूं। लेकिन यह तैयार होने का समय है?

देखो, अब नाश्ते के लिए भी टाइम नहीं बचा। इसीलिए मैं हमेशा कहती हूं कि जल्दी सोया करो।’ हमारे दौर की मांएं देखभाल करने वाली थीं, लेकिन आज के मातृत्व में एक अलग तरह का मानसिक बोझ जुड़ गया है। “क्या तुम अपना चार्जर ले गए हो?’ जैसे सबसे साधारण सवाल पूछने से लेकर पति की कार के फास्टैग में टोल का पैसा डलवाने जैसी जटिल चीजों तक- वे सब कुछ मानसिक रूप से संभाल रही होती हैं।

हमारे दौर की मांओं की तरह वे भी चाहती हैं कि आप उनकी सराहना करें, लेकिन उससे भी अधिक आज की मांएं सचमुच चाहती हैं कि कोई देखे वे अपने बच्चों, साथी और विस्तारित परिवार के लिए क्या-क्या करती हैं, और वो भी अपनी पूर्णकालिक नौकरी करते हुए। आज के पिता पहले से कहीं अधिक इनवॉल्व्ड हैं, फिर भी कई घरों में घरेलू व्यवस्था को चलाए रखने का दिखाई तक नहीं देने वाला काम और मानसिक बोझ मांएं ही अधिक उठाती हैं।

बात केवल यह नहीं है कि क्या किया जा रहा है, बल्कि यह याद रखना भी है कि किस काम को परिवार के किस सदस्य की सुविधा के अनुसार सही समय पर किया जाना है। और यह याद रखना भी उसी का हिस्सा है कि किसे पनीर पसंद है और किसे नहीं। और इसीलिए मदर्स डे को भी उनकी टु-डु लिस्ट का एक और काम नहीं बन जाना चाहिए। उनसे यह मत पूछिए कि “आप मदर्स डे कैसे मनाना चाहती हैं?’

उनसे यह मत पूछिए कि “आप क्या खरीदना चाहती हैं?’ वे यह नहीं बताना चाहतीं कि ब्रंच के लिए उन्हें किस रेस्तरां में जाना है, कौन-सी साड़ी खरीदनी है या कौन-से छोटे गहने लेने हैं। उनकी बेटी, बेटे और पति को यह पता होना चाहिए कि उन्हें क्या पसंद है और वे क्या पहनना चाहती हैं। वे मदर्स डे के दिन भी फैसले नहीं लेना चाहतीं। कम से कम आज के दिन ​तो उन्हें घर की व्यवस्था चलाने से राहत दीजिए, हालांकि मैं तो चाहूंगा कि आप ऐसा अकसर करें। मेरी मां सितारों से मुझे देखकर मुस्करा रही होंगी कि मैं आपको आज अपनी मां को बिना कोई फैसला लिए दुलार करने की सलाह दे रहा हूं।

फंडा यह है कि मांओं को अच्छा लगता है जब उन्हें यह महसूस होता है कि आप उनकी पसंद की सबसे छोटी चीज पर भी ध्यान देते हैं। यह केवल उनके लिए राहत की बात नहीं होती कि उन्होंने अच्छे और संवेदनशील बच्चों की परवरिश की है, बल्कि इससे उन्हें यह भी महसूस होता है कि उनसे प्यार किया जाता है। और यकीन मानिए, हर मां इसकी हकदार है।

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