पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: ज्ञान, कर्म और उपासना को समझकर छद्म से बचें


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9 घंटे पहले

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पं. विजयशंकर मेहता

आज के लग्जरी मार्केट में ब्रांडेड वस्तुओं में भी लगभग 8% माल नकली बताया जाता है तो सामान्य वस्तुओं की तो बात छोड़ ही दें। खान-पान की वस्तुएं नकली, किसी के नाम से कोई और परीक्षा दे दे, नौकरी किसी के नाम और कर कोई और रहा है और अब तो एआई के कारण नकली-असली का पता लगाना भी मुश्किल है। शास्त्रों में भी कई प्रसंग ऐसे आते हैं।

रावण नकली साधु बनकर सीता जी का अपहरण कर गया। विष्णु जी ने भी कुछ प्रसंगों में असली-नकली का खेल खेला। देवताओं के गुरु ब्रह्मा जी तो नकली शुक्राचार्य बन गए, जो दैत्यों के गुरु थे। शूर्पनखा के प्रसंग से भी हम समझ सकते हैं कि जीवन में जब असली-नकली का मुकाबला आए तो ज्ञान, कर्म और उपासना के मार्ग को समझकर इससे निपटा जाए।

शूर्पनखा जो थी, वैसी न बनकर नकली होकर आई। सामने थे राम, लखन, सीता। शूर्पनखा की नाक कट गई। राम ज्ञान हैं, लखन कर्म हैं और सीता उपासना हैं। अगर ये तीनों मार्ग सही हैं तो नकली से हम ठगाएंगे नहीं और असली का सदुपयोग कर जाएंगे।

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