- Hindi News
- Opinion
- N. Raghuraman’s Column Repetition Reshapes Behavior, Welcome 2026 With Positivity
4 घंटे पहले
- कॉपी लिंक
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
हमारे हाथ में सबसे ज्यादा टॉक्सिक प्रोडक्ट हमारा मोबाइल फोन है। शायद आप सहमत न हों, क्योंकि कल रात से आप इसे ही थाम कर सैकड़ों दोस्तों और परिचितों को नए साल की शुभकामनाएं दे रहे हैं और स्क्रॉल करना भूल गए।
मैंने सिर्फ पांच मिनट स्क्रॉल किया तो नए साल की पूर्व संध्या पर मुझे 26 चेतावनियां, 38 नाराजगी भरी पोस्ट, 11 एक्सपोज, 15 दोषारोपण की पोस्ट मिलीं और तारीफ वाली महज तीन दिखीं। तारीफ की यही कमी हमें हमारी सोच से भी ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है। जरा याद करें कि कल आपका दिन कैसा था।
आपने किसी एक से तो बढ़ते ट्रैफिक की शिकायत की होगी कि लगता है, पूरा शहर ही नया साल मनाने सड़कों पर आ गया है। शिकायत करना इतना सहज हो गया है कि हमें पता ही नहीं चलता कि हम शिकायत कर रहे हैं। बातचीत में, मैसेज में और हमारे विचारों में ये खुद-ब-खुद आ जाता है।
यह नुकसान रहित और यहां तक कि जायज भी लगता है। पर सच्चाई ये है कि शिकायत करना दिमाग को सिर्फ गलत चीजें देखने का प्रशिक्षण देता है। अनजाने में हम नकारात्मकता में घिरते जाते हैं और हमारे भीतर सकारात्मकता पनपने में समय लगता है।
आज साल का पहला दिन है। हमारा शहर जश्न के मूड में है तो एक चैलेंज लीजिए। अगर छुट्टी है तो परिवार में सबको कहें कि ‘आज पूरा परिवार किसी चीज की शिकायत नहीं करेगा।’ सिर्फ अगले 24 घंटे बिना शिकायत के बिताएं। एक बार भी नहीं। अगर काम पर हैं तो कभी ना कहें कि ‘मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?’ सिर्फ, एक दिन के लिए।
अगर आपको लगता है कि ये तो आसान है तो मैं बताता हूं कि ऐसा तब तक नहीं होगा- जब तक आप प्रयास नहीं करेंगे। शुक्रवार सुबह फर्क दिखेगा। मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि ये फर्क कैसे आता है। उनका दावा है कि जब आप शिकायत करते हैं तो दिमाग हमेशा समस्या पर ही टिका रहता है।
जब शिकायत बंद करते हैं तो दिमाग अलग सवाल पूछने लगता है कि ‘मैं इसमें क्या कर सकता हूं?’ आपका लहजा बदल जाता है। ध्यान अब भी समस्या पर ही होता है, पर आप उसी के बारे में सोचने रहने के बजाय बाहर निकलने के रास्ते खोजते हैं। यहीं से बदलाव शुरू होता है।
दिमाग शब्दों को लेकर सजग हो जाता है और काम की जिम्मेदारी लेने लगता है। आप अजीब-सा बदलाव महसूस करेंगे। समस्याएं वही रहेंगी, पर उतनी जटिल नहीं लगेंगी। तनाव घटेगा। धैर्य बढ़ेगा। बातचीत ज्यादा शांत होगी। ऊर्जा बदलेगी।
ऐसा इसलिए, क्योंकि समस्या शिकायत से नहीं,कार्रवाई से हल होती है। जख्म शिकायत से नहीं, सजगता से भरते हैं। जिंदगी शिकायत से नहीं, अनुशासन से बदलती है। और सबसे अहम यह कि जब आप शिकायत करना बंद करते हैं तो प्रशंसा करने लगते हैं।
अगर कुछ अच्छा दिखे तो चुप मत रहिए। लिख कर सोशल मीडिया पर पोस्ट कीजिए। जानते हैं क्यों? क्योंकि, एआई सिस्टम इंटरनेट से सीखते हैं। अगर इंटरनेट शिकायतों और नाराजगी से भरा होगा तो यकीनन इन्हें ही बढ़ाएगा। सामूहिक तौर पर आज हम इंटरनेट और सोशल मीडिया पर जो डालते हैं, उसी से भविष्य की डिजिटल टोन तय होती है।
यदि आप नहीं चाहते कि आपके बच्चे स्क्रॉल करते वक्त नकारात्मकता से घिरे रहें तो हम सबको सच्ची प्रशंसा पोस्ट करने की जिम्मेदारी लेनी होगी। झूठे रिव्यू मत लिखिए, लेकिन अगर सच में कुछ अच्छा लगे तो उसके बारे में सार्वजनिक मंच पर दो शब्द जरूर कहिए।
एआई उसे पकड़ेगा और शायद कल हमारे बच्चों के लिए थोड़ा संतुलित नजरिया पेश करेगा। अगर एक दिन का यह अभ्यास आपको सकारात्मक लगे तो अगले कुछ दिन ऐसा करें और देखें कि 2026 आपके लिए क्या नया मोड़ लेता है।
फंडा यह है कि सतत सकारात्मकता कुछ हद तक सोशल मीडिया की गंदगी साफ करेगी और हमारे व्यवहार को भी दोबारा गढ़ेगी। मतलब, आम के आम और गुठलियों के दाम। आप सबको नए साल की शुभकामनाएं।



