ट्रम्प भारत को ‘किंग ऑफ टैरिफ’ कहते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति की अनेक मान्यताएं और बयान भले ही दुरुस्त ना हों, लेकिन इस एक बिंदु पर वे सही हैं। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से भारत के पास यकीनन सबसे ऊंची टैरिफ-दीवारें और अनेक गैर-टैरिफ बाधाएं हैं। भारत के लिए बेहतर होगा अगर वो टैरिफ और गैर-टैरिफ- दोनों से संबंधित बाधाओं को कम करे। व्यापार में आने वाली रूकावटें एक विकसित राष्ट्र बनने की राह को और कठिन बना देती हैं। आत्मनिर्भर भारत के विचार में देश की मौजूदा ट्रेड-नीति का सार है। इसके चलते ही पिछले 12 वर्षों में एनडीए सरकार ने टैरिफ बढ़ाए हैं, बड़ी संख्या में गैर-टैरिफ बाधाएं खड़ी की हैं और व्यापार समझौतों से परहेज किया है। अफसोस कि जहां भारतीय मीडिया ट्रम्प के टैरिफों की तीखी आलोचना करता है, वहीं मोदी सरकार की कांग्रेस के जमाने वाली संरक्षणवादी नीतियों की ओर वापसी को खामोशी से स्वीकार कर लिया जाता है। यह भारत के हित में नहीं है। 1980 के दशक में भारत की औसत टैरिफ दर लगभग 125% के आसपास थी। इतनी ऊंची टैरिफ दरों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर के बजाय गैर-प्रतिस्पर्धी बना दिया। पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के विपरीत- जिन्होंने व्यापार के सहारे आर्थिक समृद्धि हासिल की- भारत की इस नीति ने अर्थव्यवस्था को धीमी विकास दर की राह पर बांध दिया। उस समय भारत को अक्सर ‘बास्केट केस’ कहा जाता था- यानी ऐसी गंभीर वित्तीय या आर्थिक कठिनाइयों वाला देश, जो अपने कर्ज चुकाने में भी असमर्थ हो। 1990 में यही स्थिति पैदा हो गई थी, जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर 1 अरब डॉलर से भी नीचे आ गया। यह मुश्किल से तीन हफ्तों के आयात के लिए ही पर्याप्त था। भारत को बैंक ऑफ इंग्लैंड से ऋण लेने के लिए अपने स्वर्ण भंडार को गिरवी रखना पड़ा था और आईएमएफ से 2 अरब डॉलर के आपात ऋण के लिए सम्पर्क करना पड़ा, जो अर्थव्यवस्था की री-स्ट्रक्चरिंग की शर्तों के साथ आया। इसके बाद के दो दशकों में सरकारों ने टैरिफ कम किए और 2013 तक प्रभावी टैरिफ दर घटकर 13% रह गई। लेकिन आत्मनिर्भर भारत के तहत एनडीए सरकार ने न केवल उदारीकरण को रोक दिया, बल्कि टैरिफ भी धीरे-धीरे फिर से बढ़ने लगे। 2021 तक तो प्रभावी टैरिफ दर बढ़कर 18% हो गई। गैर-टैरिफ बाधाओं का हालिया इतिहास- जो क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर्स या क्यूसीओ के रूप में सामने आया है- उतना ही चिंताजनक है। 2014 में केवल 14 क्यूसीओ लागू थे। 2025 तक इनकी संख्या बढ़कर 800 से अधिक हो गई। औपचारिक रूप से इन्हें उपभोक्ता सुरक्षा के उपाय बताया जाता है, लेकिन वास्तविकता में ये आयात को सीमित करने वाले गैर-टैरिफ उपाय हैं। उपभोक्ता सुरक्षा सुनिश्चित करने के बजाय ये भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को कमजोर कर रहे हैं और विदेशी निवेश को हतोत्साहित कर रहे हैं। अच्छी खबर यह है कि सरकार अब क्यूसीओ को कम करने पर ध्यान देती हुई दिख रही है। नवंबर 2025 में सरकार ने टेक्स्टाइल्स क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले रसायनों, पॉलिमरों और फाइबर इंटरमीडियरीज से जुड़े 14 क्यूसीओ हटाए। साथ ही ऑटोमोबाइल सहित विभिन्न उद्योगों में उपयोग होने वाले स्टील-संबंधी इंटरमीडियरीज पर लागू 55 अन्य क्यूसीओ भी समाप्त किए। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में कहा कि कस्टम्स मेरा अगला बड़ा क्लीन-अप असाइनमेंट है। उम्मीद है कि इस सफाई अभियान में टैरिफ दरों में उल्लेखनीय कटौती, टैरिफ की संख्या में कमी और अधिक से अधिक क्यूसीओ को समाप्त या कम करने जैसे कदम भी शामिल होंगे। ट्रम्प के टैरिफ-युद्ध ने भारत को आत्मनिर्भरता के खोल से बाहर निकलकर व्यापार समझौतों के जरिये नए बाजार तलाशने के लिए भी मजबूर किया है। पिछले एक वर्ष में भारत ने यूके, ओमान, न्यूजीलैंड और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के चार सदस्य देशों के साथ व्यापार समझौते किए हैं। अब ईयू से भी ट्रेड डील कर ली गई है। ऐसा लगता है कि 2026 का साल द्विपक्षीय व्यापार समझौतों में प्रवेश का साबित होगा। ट्रम्प के टैरिफ-युद्ध ने भारत को आत्मनिर्भरता के खोल से बाहर निकलकर व्यापार समझौतों के जरिये नए बाजार तलाशने के लिए भी मजबूर किया है। लगता है 2026 का साल द्विपक्षीय ट्रेड-डील्स का साबित होगा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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नीरज कौशल का कॉलम: टैरिफों के बहाने ही सही, हम ट्रेड-डील्स की ओर तो बढ़े
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