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- N. Raghuraman’s Column: Many Forms Of Bonding Are Disappearing—the Handshake Is One Of Them.
9 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
सोमवार सुबह मुंबई एयरपोर्ट पर मैंने तीन अलग-अलग ग्रुप देखे। एक छोटा और दो बड़े थे। उनमें से एक बड़ा ग्रुप मेरी ही फ्लाइट में था। वे बोर्डिंग गेट पर जुटने लगे और आपस में आईपीएल क्रिकेटर्स की तरह फिस्ट बंप से विश कर रहे थे। सभी एक सर्कल में खड़े हो गए और जब कोई दूर से उन्हें ग्रीट करता तो हाथ सीने पर रख लेते।
कुछ नमस्ते करते तो जवाब भी नमस्ते से मिलता, लेकिन साथ में हाथ भी हिलाया जा रहा था। लोग दूर से ही अपने दोस्तों को पहचान कर सर्कल में उनके पास आकर खड़े हो जाते और फिर जो हुआ, उसने मुझे चौंका दिया। वहां हर तरफ ‘एल्बो बंप’ दिख रहा था, जबकि कोविड में भी बचा रहा हैंडशेक सर्कल से बाहर बेबस-सा खड़ा था।
व्हीलचेयर पर बैठे एक व्यक्ति समेत 35 लोगों के ग्रुप में एक भी हैंडशेक नहीं हुआ। इससे मुझे लगा कि हैंडशेक अब खत्म होने वाला है। पारंपरिक हैंडशेक में पहले ही काफी गिरावट आ रही है। रिसर्च बताती है कि हर चार में से एक जेन-जी टीनेजर सोशल एंग्जायटी और डिजिटल कम्युनिकेशन को प्राथमिकता देने के कारण अजनबियों से हाथ मिलाने से बचता है।
डेटा बताता है कि अब सोशल एंग्जायटी और झिझक इसके मुख्य कारण हैं। 14-29 साल के 75% युवा मानते हैं कि उन्हें आमने-सामने बातचीत में मुश्किल होती है। युवा आज हैंडशेक को सख्त, थोड़ा अजीब और पुराने दौर का मानने लगे हैं। सामाजिक नियमों के कम्फर्ट और डिजिटल-फर्स्ट कम्युनिकेशन की ओर बढ़ने के साथ ही ग्रीट करने के नए तरीकों ने हैंडशेक को किनारे कर दिया है। तो अब क्या लोकप्रिय हो रहा है?
ये तरीके हैं- फिस्ट बंप, हैंड क्लैप, हाई फाइव, वेव, ‘हाय’ बोल कर मौखिक अभिवादन या महज सिर हिला देना- खासकर जब लोग पहले से एक-दूसरे के साथ सहज हों। जहां 75% पैरेंट्स चिंतित हैं कि उनके बच्चे व्यक्तिगत जुड़ाव की क्षमता खो रहे हैं, वहीं यह बदलाव ज्यादा अनौपचारिक, कम जर्म-सेंसिटिव और कम एंग्जायटी वाले तरीकों से जुड़ा प्रतीत होता है।
मुझे याद है कि हमारे कॉलेज में हैंडशेक क्लास होती थी। हमें ‘परफेक्ट’ हैंडशेक के नियम सिखाए गए थे। उन दस में से तीन प्रमुख नियम ये थे। ‘डिग्री ऑफ प्रेशर’ महत्वपूर्ण है। इसे ‘गोल्डीलॉक्स’ कहते हैं- मजबूत, किन्तु हल्के दबाव वाली पकड़। ढीला हाथ कमजोर, अविश्वसनीय या आलसी चरित्र का संकेत माना जाता था।
सख्त हायरार्की (कौन शुरुआत करता है?): आप किसी को भी अपना हाथ नहीं दे सकते। एक सख्त ‘टॉप-डाउन’ प्रोटोकॉल था। जेंडर फर्स्ट: पुरुष कभी महिला की ओर पहले हाथ नहीं बढ़ाता। उसे इंतजार करना होता था कि महिला हाथ बढ़ाए। अगर वे नहीं बढ़ातीं, तो वह बस झुक जाता।
रैंक और उम्र: आयु में छोटा व्यक्ति इंतजार करता था कि बड़ा शुरू करें। सामाजिक तौर पर ‘इंफीरियर’ अपने ‘सुपीरियर’ का इंतजार करता था। ऊंचे दर्जे के व्यक्ति की ओर पहले हाथ बढ़ाने को ‘जबरन पहल करना’ मानते थे।
बॉडी लैंग्वेज पर फोकस: एक ‘परफेक्ट’ हैंडशेक में सही आई-कॉन्टैक्ट शामिल है। नजरें चुराना संदिग्ध माना जाता था। फिर अकसर हाथ मिलाने के साथ सिर या शरीर के ऊपरी हिस्से को सम्मानजनक तरीके से थोड़ा झुकाया जाता था। बायां हाथ साइड में रहता था। हैंडशेक अकेला खत्म नहीं हो रहा है। इसके साथ ‘थैंक यू नोट लिखना’ या ‘फोन कॉल करना’ या फिर ‘बिना इमोजी के एक पत्र लिखना’ भी शामिल हैं।
फंडा यह है कि इंसान अभी भी स्पर्श करने वाले प्राणी हैं। सही प्रकार से किया गया फिजिकल टच ऑक्सीटोसिन रिलीज करता है और ऐसा भरोसा बनाता है, जिसे शब्द नहीं बना सकते। हालांकि, हैंडशेक ‘डिफॉल्ट ग्रीटिंग’ का दर्जा खो चुका है। तो क्या हमें इसका शोक संदेश लिखना चाहिए, या इसे री-इन्वेंट करना चाहिए। अपने विचार लिखें।
