देसी पटाखा गन से 188 लोगों की आंखें जलीं:  भोपाल में 150 से ज्यादा, ग्वालियर में 19 केस सामने आए; कॉर्निया खराब होने की आशंका – Bhopal News

देसी पटाखा गन से 188 लोगों की आंखें जलीं: भोपाल में 150 से ज्यादा, ग्वालियर में 19 केस सामने आए; कॉर्निया खराब होने की आशंका – Bhopal News


देसी पटाखा गन (कार्बाइड) से प्रदेश भर में अब तक 188 लोगों की आंखों में जलन के मामले सामने आए हैं। अकेले भोपाल में ही 150 से ज्यादा लोगों की आंखें जल चुकी हैं। ग्वालियर में भी बुधवार शाम को ही ऐसे 19 मामले सामने आए हैं।

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इसी तरह इंदौर में 3, विदिशा में 12 और अन्य 3 जगह पटाखा गन से आंखें जलने की घटनाएं हुई हैं। इनमें ज्यादातर घटनाएं 7 से 14 साल तक के बच्चों के साथ हुई हैं।

भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) के नेत्र विभाग में 36 मरीजों का इलाज चल रहा है। अब तक 15 की सर्जरी की जा चुकी है। दो बच्चों की आंखों में डॉक्टरों ने एमनियोटिक मेम्ब्रेन (झिल्ली) लगाई है। यह वही झिल्ली जो प्रसव के दौरान गर्भ से निकलती है।

डॉक्टरों का कहना है कि यह ‘जीवित पट्टी’ घाव भरने और आंख की पारदर्शिता बनाए रखने में मदद करती है। झिल्ली इंदौर से मंगाई गई थी। इसे लगाने के दो से तीन सप्ताह बाद ही पता चलेगा कि आंखों की रोशनी कितनी बच सकी है।

ग्वालियर में एक दिन में 19 केस ग्वालियर में एक के बाद एक कई केस सामने आए हैं। तीन दिन में 19 युवा कार्बाइड गन से घायल हुए हैं। बुधवार को गोहद निवासी दो युवक सतेन्द्र और सूरज ग्वालियर के डीडी नगर में कार्बाइड गन चलाते समय घायल हुए हैं। दोनों की आंख का कॉर्निया बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया है। सतेंद्र नाम के एक घायल की हालत गंभीर होने पर उसे भोपाल एम्स रेफर किया गया है।

ऐसे 8 घायलों का ऑपरेशन किया गया है। ऑपरेशन कितना सफल रहा और रोशनी कितनी हद तक लौट पाएगी यह कह पाना मुश्किल है। दोनों केस जिला अस्पताल मुरार के नेत्र रोग विभाग में आए हैं। जिला अस्पताल, जेएएच और रतन ज्योति नेत्रालय में सबसे ज्यादा केस आए।

भोपाल में सबसे ज्यादा 150 केस देसी पटाखा गन से आंखों के क्षतिग्रस्त होने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। 19 से 22 अक्टूबर शाम 7 बजे तक 150 मामले अलग-अलग अस्पतालों से सामने आ चुके हैं। इनमें से सबसे ज्यादा 36 केस गांधी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) में दर्ज हुए।

विदिशा मेडिकल कॉलेज में 12 और सागर मेडिकल कॉलेज में 3 और इंदौर में 3 केस आए। बाकी केस भोपाल के सरकारी अस्पतालों और क्लीनिकों में दर्ज हुए हैं।

सस्ती देसी गन बनी खतरनाक ट्रेंड बाजार में 100 से 200 रुपए में मिलने वाली यह गन अब ‘खतरनाक ट्रेंड’ बन चुकी है। डॉ. एसएस कुबरे ने बताया कि इसमें भरा कैल्शियम कार्बाइड (Calcium Carbide) पानी के संपर्क में आने पर एसिटिलीन गैस (Acetylene Gas) बनाता है। यह गैस विस्फोट के साथ जलती है और कुछ ही सेकेंड में आंखों, त्वचा और चेहरे को झुलसा देती है।

यह ‘गन’ पटाखा नहीं, केमिकल उपकरण बीएमएचआरसी की नेत्र विभागाध्यक्ष डॉ. हेमलता यादव के अनुसार, यह गन केमिकल रिएक्शन से विस्फोट करती है। जब गन नहीं चलती, तो बच्चे उसकी नाल में झांकते हैं। उसी समय गैस का दबाव बढ़ता है और धमाका होता है। यह ‘गन’ कोई पटाखा नहीं, बल्कि यह रासायनिक उपकरण है। जो पलभर में आंखों की रोशनी छीन सकता है।

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1. मां के गर्भ की झिल्ली से रोशनी बचाने की कोशिश

देसी पटाखा गन से अकेले भोपाल में 150 से ज्यादा लोगों की आंखें जल चुकी हैं। इनमें सबसे ज्यादा 7 से 14 साल के बच्चे शामिल हैं। गांधी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) के नेत्र विभाग में 36 मरीजों का इलाज चल रहा है। अब तक 15 की सर्जरी की जा चुकी है, जबकि दो बच्चों की आंखों में डॉक्टरों ने एमनियोटिक मेम्ब्रेन लगाई है। पढ़ें पूरी खबर…

2. MP में देसी पटाखा गन फोड़ रही बच्चों की आंखें भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज के नेत्र वार्ड में मंगलवार दोपहर सात साल का अलजैन दर्द से बिलख रहा था। दिवाली की रात वह दोस्तों के साथ खेलते हुए ‘देसी पटाखा गन’ चला रहा था, जैसे ही गन ने फायर करना बंद किया, उसने मासूम जिज्ञासा में नाल में झांका, तभी तेज धमाका हुआ और उसकी बाईं आंख झुलस गई। पढ़ें पूरी खबर…



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