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- Sanjay Singh’s Column Disasters Used To Happen Earlier Too But Not Like Today
21 घंटे पहले
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संजय सिंह जल जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक
हाल ही में दिल्ली में यमुना का जलस्तर 207.48 मीटर तक ऊंचा हो गया, इससे कई निचले इलाकों में पानी भर गया। पंजाब में 1,900 गांव बाढ़ से प्रभावित हुए, जिससे 400,000 एकड़ फसल की भूमि जलमग्न हुई और 3.84 लाख लोग प्रभावित हुए- यह 1988 के बाद सबसे भयंकर बाढ़ मानी जा रही है। धराली और वैष्णोदेवी की घटनाएं भी इसी कड़ी में हैं।
पिछले साल भी केरल के वायनाड जिले में 30 जुलाई की रात हुए भीषण भूस्खलन ने चूरालमाला और मुंडक्काई क्षेत्रों (मेप्पाड़ी ग्राम पंचायत) को पूरी तरह तबाह कर दिया था। आपदा से एक दिन पहले हुई अभूतपूर्व बारिश- जो जिले की सालाना औसत का 6% थी- ने स्थिति को और गंभीर बना दिया।
इस घटना में लगभग 400 लोगों की जानें गईं और 200 से अधिक शव चालीयार नदी में 40 किमी दूर तक मिले। सरकारी आंकड़ों के अनुसार केरल का लगभग 40% हिस्सा भूस्खलन-प्रवण क्षेत्र में आता है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन की जलवायु जल विज्ञानी डॉ. लिसा कॉर्टेज के अनुसार, पहले जिस बारिश को ‘सदी में एक बार’ होने वाली घटना माना जाता था, अब कुछ इलाकों में हर कुछ वर्षों में हो रही है।
2023 में नेचर पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में पाया गया कि 1950 के दशक के बाद से भारत के अधिकांश हिस्सों में अत्यधिक बारिश की घटनाएं 20% से 50% तक बढ़ी हैं। भारत मौसम विभाग के आंकड़े भी बताते हैं कि बादल फटने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, खासकर हिमाचल, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों में।
दुनिया भर के वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव के कारण प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति, तीव्रता और विनाशकारी क्षमता लगातार बढ़ रही है। बढ़ते वैश्विक तापमान के चलते समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, मौसम के पैटर्न असामान्य हो रहे हैं और अतिवृष्टि, सूखा, चक्रवात, बाढ़ तथा भूस्खलन जैसी घटनाएं अधिक बार और पहले से अधिक भीषण रूप में घटित हो रही हैं। यह न केवल मानव जीवन और आजीविका के लिए खतरा है, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता पर भी गहरा असर डाल रहा है।
आजादी के समय भारत में जो आपदाएं आती थीं, उनकी तुलना में आज स्थिति कहीं अधिक गंभीर हो चुकी है। वर्तमान में देश के 40% क्षेत्र सूखा-प्रभावित हो चुके हैं, जबकि बाढ़-प्रभावित क्षेत्रों में 60% से अधिक की वृद्धि हुई है। नए बाढ़-प्रवण क्षेत्र बन रहे हैं और जहां पहले सूखा पड़ता था, अब वहां बाढ़ आने लगी है।
इस वर्ष गुजरात से महाराष्ट्र, राजस्थान और बुंदेलखंड से लेकर महाकौशल तक के इलाकों में अत्यधिक वर्षा हुई। इसके परिणामस्वरूप बुंदेलखंड जैसे सूखाग्रस्त क्षेत्र में भी बाढ़ आ गई। जालौन, हमीरपुर और बांदा जिलों के बड़े हिस्से प्रभावित हुए। यमुना का जलस्तर 1994 में पार किए गए खतरे के निशान से तीन मीटर अधिक हो गया।
प्राकृतिक आपदाओं की यह बढ़ती रफ्तार आने वाले समय के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इसके कारण बड़े पैमाने पर भूमि का कटाव हुआ, फसलों का नुकसान हुआ और यह सब एक-दो दिनों में नहीं बल्कि वर्षों से हो रहे जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों का नतीजा है।
अब सरकारों की भारी-भरकम धनराशि आपदाओं से निपटने में खर्च हो रही है, जबकि किसान आर्थिक संकट में हैं और पर्यावरण लगातार क्षतिग्रस्त हो रहा है। भविष्य की आपदाओं से बचाव के लिए हमें जलवायु-उपयुक्त कृषि पद्धतियों को अपनाना होगा। वर्षा जल संचयन, तालाब और जलाशयों के संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी।
बाढ़ और सूखे से निपटने के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली और स्थानीय आपदा प्रबंधन योजनाओं को मजबूत करना होगा। शहरी-ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में हरित क्षेत्र (ग्रीन कवरेज) बढ़ाकर भूमि के कटाव और तापमान वृद्धि को कम करना होगा।
यह समय है कि हम अनियोजित विकास के मॉडल को छोड़कर, स्थायी और सतत विकास की ओर बढ़ें, ताकि भविष्य में आपदाओं के प्रभाव को कम किया जा सके। अनियोजित विकास- जैसे नदियों के किनारे अतिक्रमण, जलनिकासी मार्गों का अवरोध और हरित क्षेत्र का लगातार कम होना- आपदाओं के असर को और गंभीर बना रहा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



