जब पूरा देश कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर्स की भारी कमी से जूझ रहा था तो कई इनोवेटिव होटलियर्स ने नए आइडिया विकसित किए। इन आइडियाज ने न सिर्फ उस बिजनेस के लोगों को चौंकाया, बल्कि इनमें से कुछ लंबे समय तक टिकने वाले भी हैं- जैसे कोविड में शुरू हुआ वर्क फ्रॉम होम आज भी कई जगह जारी है। ऐसे ही कुछ प्रमुख आइडिया यहां पेश हैं। मुंबई के निकट उल्हासनगर के कैटरर्स के ऐसे इनोवेटिव आइडिया से न सिर्फ उनका व्यवसाय चल रहा है, बल्कि फलफूल भी रहा है। वे अलग-अलग प्राइजिंग के साथ एक नया बिजनेस मॉडल लाए, जिसे ग्राहकों ने भी अपनाया। उनके मेन्यू कार्ड में इसे ‘सिलेंडर प्लान’ कहा गया। इसमें ग्राहक को खुद का सिलेंडर लाना होता है, जिसे ‘ब्रिंग योर ओन सिलेंडर’ (बीबायओसी) कहते हैं। अब इस उपनगरीय इलाके में वंदना कैटरर्स के सागर सोना कोई ऑर्डर रिजेक्ट नहीं करते। चाहे वह शादी हो, बर्थडे पार्टी, बेबी शावर, नामकरण उत्सव हों या पुण्यतिथि जैसे सामाजिक कार्यक्रम। परिवार बीबायओसी अपना रहे हैं और कैटरर्स का खोया बिजनेस वापस मिल रहा है। कुछ मोबाइल रेस्तरां ने ‘प्री-ऑर्डर पिकअप स्टेशन’ शुरू किए हैं, जिसमें ‘प्री ऑर्डर स्ट्रैटजी’ को प्रोत्साहित किया गया है। इसमें ग्राहक पहले-से ऑर्डर करता है, ताकि किचन में एक जैसी डिशेज एक साथ बनाकर गैस बचाई जा सके। इन डिशेज को पिकअप करने के लिए वे स्टोर में खास जगह बनाते हैं। इसकी लागत पहले से कम पड़ती है। गुजरात में टी स्टॉल्स और छोटे कैफेज दरवाजों पर सोलर कंसंट्रेटर लगा रहे हैं। चाय, कॉफी का पानी उबालने के लिए पैराबॉलिक मिरर लगाने का यह आइडिया असल में बिजनेस ट्विस्ट भी है, जाे लोगों को आकर्षित करता है। यह ग्राहकों को बताता है कि ‘हमारे दाम स्थिर हैं, क्योंकि सूरज तो फ्री है।’ इससे बिजनेस ‘गैस निर्भर ईटरी’ के बजाय ‘नई तकनीक वाले ग्रीन कैफे’ में बदल रहे हैं, जो युवाओं और पर्यावरण प्रेमियों को आकर्षित करता है। रेस्तरां की बात करें, तो छोटे रेस्तरां में सबसे बड़ा चलन है कि वे कम कीमत पर कम मात्रा वाला खाना दे रहे हैं। इनमें ‘मिनी मील्स’ सबसे ज्यादा बिक रहा है। इससे इन रेस्तरां को ऐसे नए ग्राहक मिल गए हैं, जिनके बारे में उन्होंने सोचा तक नहीं था। यकीन मानिए, गैस सप्लाई सुचारू होने पर भी ये नए ग्राहक उन्हें कुल बिक्री का एक तिहाई हिस्सा देते रहेंगे। कुछ ग्रेड-1 रेस्तरां अब 1000 कैलोरी वाला खाना देने लगे हैं, जिससे कैलोरी कॉन्शस लोगों को मेनू में नया विकल्प मिला है। इन मेनू के मेन कोर्स में कच्चा सलाद, हल्का उबला खाना और कम तला भोजन होता है। ‘रॉ-बार’ तेजी से बढ़ रहे हैं। ‘1000 कैलोरी मील’ से भी आगे कई भारतीय शहरी कैफे ‘फायरलेस फ्रंट्स’ शुरू कर रहे हैं, जिनमें कार्पेसियो, स्प्राउटेड सलाद, फर्मेंटेड प्रोबायोटिक बाउल्स और कोल्ड सूप (जैसे गजपाचो) के अलग काउंटर होते हैं। खाने से ‘फायर’ यानी आग हटाकर वे गैस की भारी जरूरत को घटा देते हैं। इन आइटम्स में ज्यादा मुनाफा होता है, क्योंकि इनमें चाकू से काटने और सजाने की स्किल तो ज्यादा लगती है, लेकिन ईंधन नहीं लगता। ढाका के रेस्तरां ‘ऑन-डिमांड’ कुकिंग के बजाय ‘टाइमलाइन मेन्यू’ की ओर बढ़ रहे हैं। रेस्तरां के बाहर समय प्रदर्शित होता है- ‘फ्रेश बिरयानी दोपहर 1, 4 और रात 8 बजे मिलेगी।’ दिन में सिर्फ तीन बार बर्नर जला कर एक साथ बड़ी मात्रा में खाना बनाया जाता है, जिसमें वे गैस का बेहतर इस्तेमाल करते हैं। ग्राहक भी भूख को इसी के अनुसार ढाल लेते हैं, जिससे चुनिंदा घंटों में भीड़ और उत्साह का माहौल बनता है। याद रखिए, ऐतिहासिक रूप से युद्धों ने कभी वैश्विक अर्थव्यवस्था की बढ़ने की क्षमता समाप्त नहीं की। इंसान बुद्धि का इस्तेमाल कर अपने संसाधनों को नए सिरे से व्यवस्थित करने के लिए सुविख्यात हैं। वे ऐसा न सिर्फ जीने के लिए, बल्कि आगे बढ़ने के लिए भी करते हैं। फंडा यह है कि मौजूदा युद्ध की तरह जब भी कोई अप्रत्याशित घटना होती है तो इंसान संकट से निपटने वाले इनोवेशन के लिए जाना जाता है। ऐसे में लोग ‘साधारण लीडर’ बने रहने के बजाय ‘थॉट-लीडर’ बनकर समाधान ढूंढ़ते हैं।
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