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- N. Raghuraman’s Column: The Poison Of Apps Will Only Be Eradicated By Apps.
4 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
कल्पना कीजिए कि आपका 10वीं या 12वीं में पढ़ने वाला बच्चा एक नामी स्कूल में प्रवेश करता है। गेट पर लगे बड़े क्यूआर कोड पोस्टर्स को मोबाइल से स्कैन करता है और क्लास में चला जाता है। क्लासरूम में टीचर्स खुश हैं, क्योंकि कोई बच्चा मोबाइल से नहीं चिपका हुआ। लंच में बच्चे आपस में बातें कर रहे हैं, मजे कर रहे हैं और इस मस्ती में सेलफोन कहीं नजर नहीं आता। रीसस में वे अपने पैरेंट्स से बात करना चाहते हैं तो इजाजत लेकर निर्धारित स्थान पर जाकर उन्हें कॉल करते हैं।
जब से आपने बच्चे को इस स्कूल में डाला है, वह आदतन अपने मोबाइल तक नहीं पहुंचता। वे अच्छी नींद ले रहे हैं। अचानक उनके नंबर अच्छे आने लगे। इससे न सिर्फ कैंपस का माहौल बदला, बल्कि आपका बच्चा भी ज्यादा शांत, कम चिड़चिड़ा और कम जिद्दी हो गया। आपको कॉल करने के अलावा उनमें से किसी ने स्कूल टाइम में एक बार भी मोबाइल नहीं देखा।
दिलचस्प यह है कि टिकटॉक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, एक्स, डिस्कॉर्ड, पोकेमोन गो, थ्रेड्स, रेडिट, रोब्लॉक्स और क्लैश रॉयाल जैसे आकर्षक एप भी बच्चों को मोबाइल के प्रति आकर्षित नहीं कर पाए। सोच रहे हैं कैसे? अगर आप सोच रहे हैं कि शायद स्कूल फोन लॉक करने वाले मैग्नेटिक पाउच इस्तेमाल कर रहा है तो आप गलत हैं।
आपको याद है कि स्कूल में घुसते वक्त बच्चों ने मोबाइल कैमरे से क्यूआर कोड स्कैन किया था। जादू वहीं छिपा था। इस एप से न सिर्फ अटेंडेंस लगती है, बल्कि जैसे ही बच्चा क्यूआर कोड स्कैन करता है– यह सोशल मीडिया और गेमिंग एप को ब्लॉक कर देता है। यह घमंड ना पालो कि आपका बच्चा किसी भी प्रतिबंध को डिसेबल कर सकता है। क्योंकि जैसे ही काेई स्टूडेंट एप डिसेबल करता है, रीयल टाइम में इसकी सूचना डैशबोर्ड पर स्कूल अधिकारियों तक पहुंच जाती है।
अब सवाल उठता है कि यह एप क्या है और ऐसे सकारात्मक नतीजों के लिए कौन-सा स्कूल इसका इस्तेमाल कर रहा है। तो हार्वर्ड-वेस्टलेक स्कूल में आपका स्वागत है। यह लॉस एंजिलिस, कैलिफोर्निया में 7वीं से 12वीं कक्षा तक का प्रतिष्ठित, स्वतंत्र और को-एजुकेशनल कॉलेज-प्रेपरेटरी डे स्कूल है। अपने कड़े अकादमिक मानकों, मजबूत खेल संस्कृति और एलुमनाई के लिए प्रख्यात इस स्कूल का मकसद अपने स्टूडेंट्स में ईमानदारी, एक्सिलेंस और मकसद को प्रोत्साहित करना है।
यह स्कूल ‘ओपल’ एप का इस्तेमाल करता है। इसे केनेथ श्लेनकर ने 2020 में एक स्क्रीन टाइम मैनेजमेंट एप के तौर पर बनाया था, ताकि लोगों के डिजिटल अनुभव में ‘प्रोडक्टिव फ्रिक्शन’ जोड़ कर उन्हें बेहतर फोकस करने में मदद हो सके। गूगल में काम करते वक्त केनेथ को इसकी प्रेरणा मिली।
जब स्कूल ने केनेथ को मेल कर पूछा कि क्या कंपनी के पास एजुकेटर्स के लिए कोई प्रोडक्ट है तो उन्हें लगा कि वो इस प्रोडक्ट को अपग्रेड करके स्कूल के लिए भी तैयार कर सकते हैं। स्कूल ने पिछले वर्ष स्टूडेंट काउंसिल के सदस्यों से एप इस्तेमाल करने को कहा। चूंकि फीडबैक पॉजिटिव रहा तो कंपनी ने ‘ओपल फॉर स्कूल्स’ नाम से पेड वर्जन तैयार किया, जिसमें नियमों की पालना कराने के लिए एडमिनिस्ट्रेटर्स को डैशबोर्ड भी दिया गया।छात्र हितों की रक्षा के लिए ओपल एप स्कूलों को एप्स के भीतर छात्रों की गतिविधि देखने की अनुमति नहीं देता।
डैशबोर्ड को अटेंडेंस शीट जैसा बनाया गया है, जो छात्र का लॉग इन, लॉग आउट और यह दिखाता है कि क्या उसने स्कूल की ब्लॉक सेटिंग्स से कोई छेड़छाड़ की है। छात्रों को भी बेहतर लग रहा है, क्योंकि फोन को पूरी तरह छीन लेने या मैग्नेटिक पाउच में बंद करने के बजाय वे खुद ही डिस्ट्रैक्शन मैनेज करना सीख रहे हैं। ज्यादातर स्कूल भी बीच का रास्ता ही चाहते हैं कि फोन विद्यार्थियों के पास ही रहे लेकिन ध्यान न भटके। इसीलिए कंपनी ने पेड फीचर तैयार किया है, जिसकी लागत 20 डॉलर प्रति छात्र प्रति वर्ष है।
फंडा यह है कि जैसे लोहे को लोहा काटता है,वैसे ही एप, एप को काटेगा। क्या हम भारतीय स्कूलों के लिए भी ऐसा ही कोई एप विकसित कर सकते हैं?



