स्कूल बस स्टॉप पर खड़े होकर, फोन स्क्रॉल करते हुए भले ही आप दूसरों को व्यस्त होने का आभास कराएं, लेकिन कान खुले रखिए ताकि सुन सकें कि स्कूल जाने वाले हमारे बच्चे बीते एक हफ्ते से क्या बात कर रहे हैं। सभी नहीं तो कम से कम कुछ बड़े बच्चे तो तीसरे विश्व युद्ध की बातें कर रहे होंगे और छोटे बच्चे उसे बड़े ध्यान से सुन रहे होंगे। उन ‘चंद’ बच्चों को दोष मत दीजिए। बीते दिनों में वैश्विक घटनाओं ने ऐसा मोड़ लिया है कि वे बच्चे इनसे वाकिफ हैं। अगर वे ‘कुछ’ बच्चे युद्ध से परेशान हैं तो हमें यह समझना होगा कि उनसे इस विषय पर बात कैसे की जाए। विशेषज्ञ हमें यह याद रखने की सलाह देते हैं कि बच्चे पैरेंट्स और बड़ों से ही सुरक्षा का भाव सीखते हैं। तो हमें क्या करना चाहिए? भले यह मसला देशों के बीच भू-राजनीतिक व रणनीतिक संबंधों जैसा जटिल और उनकी समझ से परे का हो, लेकिन सबसे पहले अपना लहजा और बॉडी लैंग्वेज शांत रखें। पहले खुद जिज्ञासु बनकर उनकी आंखों में देखते हुए पूछें कि ‘ओह, तुम्हारे दोस्त इस बारे में बात कर रहे हैं?’ फिर दोस्त की तरह कंधे पर हाथ रखकर कहिए, ‘यह बहुत मैच्योर विषय है।’ यह स्पर्श उन्हें भरोसा देगा और वे आपको हर चीज बताएंगे, जिससे अब तक डर रहे थे। फिर जिज्ञासा दिखाइए और पूछिए कि ‘आपने क्या देखा या सुना है?’ ऐसे विषय पर बातचीत का बुनियादी नियम है कि बात छोटी रखें और उनके मन, डर और उम्मीद को समझने के लिए सवाल पूछते रहें। यह बातचीत बताएगी कि ये जानकारी उन्हें कहां से मिल रही है। कुछ सोशल प्लेटफॉर्म्स सूचना को बढ़ा-चढ़ाकर और तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं। उन्हें समझाएं कि वीडियो में कुछ देख लेना साबित नहीं करता कि वह सच ही है। उन्हें बताएं कि कैसे एआई के जरिए ऐसी चीजें बनाई जा रही हैं। उनके हर सवाल का जवाब देने के बजाय, उनके सवाल में से ही नया सवाल पूछिए। मसलन, ‘तुम्हें क्या लगता है, जो एक्सप्लेनेशन तुम दे रहे हो उसका क्या कारण हो सकता है?’ इससे वे खुलकर बोलेंगे और उनके सोचने का तरीका पता चलेगा। फिर एक अभिभावक के तौर पर बच्चे की उम्र के अनुसार बातचीत को आगे बढ़ाने का उचित तरीका चुनें। हाल ही में जब एक शिक्षिका ने बच्चों की ऐसी ही बातें सुनीं तो उन्होंने काउंसलर से मदद मांगी। एक बच्चा कह रहा था कि ‘दुनिया में तीसरा विश्व युद्ध होने जा रहा है।’ दूसरे ने घबराकर पूछा ‘क्या हम सब मर जाएंगे?’ विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसी स्थिति में जोर से हंसें, लेकिन ‘इसे खारिज भी ना करें। सावधानी से सही बात समझाएं।’ विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि पहले उनसे सहानुभूति जताइए कि ‘ओह, यह सचमुच परेशान करने वाली या डराने वाली बात है।’ फिर शांत और तर्कपूर्ण तरीके से समझाएं कि यह बस घबराहट में फैलाया गया नैरेटिव है, हकीकत नहीं। अगर वे पूछें कि ‘आपको कैसे पता?’ तो अपने कॉमन सेंस से जवाब दें कि जैसे आप नहीं चाहते, वैसे ही दुनिया भी जंग नहीं चाहती। चाइल्ड स्पेशलिस्ट कहते हैं कि बच्चों को परफेक्ट जवाब नहीं चाहिए, लेकिन यह भरोसा चाहिए कि वे और उनके माता-पिता सुरक्षित रहेंगे। मौजूदा घटनाक्रम को लेकर टीनेजर्स में भावनाएं बहुत गहरी हो सकती हैं और इस पर उनकी राय भी बंटी हो सकती हैं, जो अकसर उन्हें कहीं से फीड की गई होती है। ऑनलाइन कॉनफ्लिक्ट्स कई बार ऑफलाइन पूर्वग्रहों में बदल जाते हैं। इसीलिए जरूरी है कि उनके प्रति सहानूभूति दिखाई जाए और शर्मिंदा किए बिना उनकी गलत जानकारी को ठीक किया जाए। मेरे संपर्क में आने वाले बच्चों को मैं हमेशा ज्यादा से ज्यादा अखबार पढ़ने की सलाह देता हूं। आप भी कोई संतुलित और जानकारीपूर्ण लेख पढ़ें तो उनसे साझा करें। फंडा यह है कि संवेदनशील मुद्दों पर बच्चों से ऐसे बात करें, जैसे किसी अजनबी से कर रहे हों। बातचीत में आप शांत रहें और सही सूचनाओं और विश्लेषण के जरिए उन्हें प्रभावित करने की कोशिश करें।
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एन. रघुरामन का कॉलम: वैश्विक मुुद्दों पर बच्चों से कैसे बात करें?
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