एन. रघुरामन का कॉलम:  2026 में खुद से थोड़ा और बेहतर कैसे बनें?

एन. रघुरामन का कॉलम: 2026 में खुद से थोड़ा और बेहतर कैसे बनें?


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4 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

“कृपया 1 से 4 जनवरी तक सुबह की सैर से बचें। इस समयावधि में फिट रहने का रिजॉल्यूशन लेने वाले लोगों की बड़ी और अप्रत्याशित भीड़ उमड़ने की संभावना है। बहरहाल, 5 जनवरी से हालात सामान्य हो सकते हैं।’

इस साल मुझे मिला यह चेतावनी-संदेश पहले तो मेरे चेहरे पर मुस्कान ले आया, लेकिन फिर इसने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि अधिकांश रिजॉल्यूशन असफल क्यों हो जाते हैं? और यह नाकामी मानव व्यवहार के बारे में क्या बताती है?

इसी के चलते मैं एक ‘उत्तम’ न्यू ईयर रिजॉल्यूशन के लिए उपाय तलाशने लगा।हर जनवरी हममें से लाखों लोग बिना किसी डेटा के साहसी अनुमान लगाते हैं, बिना किसी फीडबैक के रणनीतियां अपनाते हैं और जिम की सदस्यताएं ले लेते हैं।

जैसे-जैसे दिन बीतते हैं, वह ‘हम’ जिसने रिजॉल्यूशन लिया था, और वह ‘हम’ जिसे उसे निभाना था- दोनों आधिकारिक तौर पर एक-दूसरे से तलाक की अर्जी लगा देते हैं!​ ठंडा मौसम हमारे भीतर की आग को बुझा देता है और हममें से अधिकांश लोग पिछले साल के दिसंबर वाले संस्करण में लौट आते हैं। क्यों?

क्योंकि जब हम यह अनुबंध करते हैं, तो हम भविष्य की अपनी इच्छा-शक्ति का अनुमान लगा रहे होते हैं। हम अपने एक आदर्श रूप की कल्पना करते हैं- अनुशासित, सही भोजन करने वाला, सदाचारी, भोर में उठने वाला- न कि अनुभवों से जाने गए हमारे उस वास्तविक रूप की, जो अलार्म बजते ही स्नूज बटन दबा देता है।

मानव-व्यवहार का अध्ययन करने वाले सामाजिक विज्ञान में इसे ‘प्रजेंट बायस’ कहा जाता है, जो 1 जनवरी को सबसे अधिक दिखाई देता है। कॉलेज के दिनों में, नववर्ष के बाद आने वाले पहले रविवार को ‘डिच न्यू ईयर्स रिजॉल्यूशन डे’ कहा जाता था। और चूंकि आज रविवार है, इसलिए एक बड़ा वर्ग अपने रिजॉल्यूशंस को ताक पर रखने में व्यस्त होगा।

इससे यह सवाल उठ खड़ा होता है कि यदि खराब पूर्वानुमान, समय के प्रति अनियमितता और हमारे इरादों और व्यवहार के बीच मौजूद खाई ‘तलाक’ की उपरोक्त वर्णित अर्जियों के लिए जिम्मेदार हैं, तो फिर इस रिश्ते को चलाए रखने के लिए क्या कारगर है?

मानव-व्यवहार का अध्ययन करने वाले कहते हैं कि ‘एप्रोच-ओरिएंटेड’ लक्ष्य, ‘अवॉइडेंस’ वाले लक्ष्यों की तुलना में 26% अधिक सफलता देते हैं। जैसे ‘सप्ताह में तीन-चार बार व्यायाम करना’ जैसे वाक्यों वाला रिजॉल्यूशन ‘1 जनवरी से जंक फूड खाना बंद करना’ की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करता है।

इसी तरह, ‘हर रात 20 मिनट किताब पढ़ना’, ‘स्क्रीन टाइम 20 मिनट कम करना’ से अधिक प्रभावी है। ‘अवॉइडेंस’ लक्ष्य निरंतर सतर्कता और इच्छा-शक्ति की मांग करते हैं, जबकि ‘एप्रोच’ लक्ष्य एक लय बनाते हैं।सफलता में चॉइस-आर्किटेक्चर की बड़ी भूमिका होती है।

इसका अर्थ है जिस परिवेश या संदर्भ में लोग निर्णय लेते हैं, उन्हें इस तरह से गढ़ते हुए विकल्पों को प्रस्तुत करना कि इससे उनके चयन प्रभावित हों। और वह भी उनकी स्वतंत्रता को सीमित किए बिना।

थेलर और सनस्टीन द्वारा गढ़ी गई यह अवधारणा मानती है कि हर निर्णय-परिवेश की अपनी एक संरचना होती है, चाहे वह जानबूझकर बनाई गई हो या नहीं, और वह नतीजों को प्रभावित करती है- कैंटीन में भोजन की व्यवस्था से लेकर घर में किताबें रखने तक।

आज अनेक घरों के हर कमरे में टीवी स्क्रीन हैं, किताबों की अलमारियां नहीं; इसलिए बच्चों को पढ़ने की ओर आकर्षित करना कठिन हो जाता है। जिन घरों में किताबें होती हैं और जहां पैरेंट्स पढ़ते हैं, वहां बच्चे भी उस आदत को अपना लेते हैं। इसीलिए लक्ष्य छोटा रखें, जैसे रोज सुबह उठते ही तीन पुश-अप करना।

इस संकल्प के कई दिनों तक टिके रहने की अधिक संभावना है और धीरे-धीरे यह आदत बन जाता है, जिसके बाद उसे बढ़ाया जा सकता है- जैसा कि डॉ. बी.जे. फॉग की किताब ‘टाइनी हैबिट्स मैथड’ में बताया गया है। तो यदि आप 2026 में अपने आज के रूप से थोड़ा बेहतर बनना चाहते हैं, तो तीव्रता को प्राथमिकता देने से पहले छोटे लक्ष्यों के साथ निरंतरता का अभ्यास करें।

फंडा यह है कि जब आप सेल्फ-इम्प्रूवमेंट को किसी निवेश की तरह देखेंगे, जिसमें आपके फैसले ठोस साक्ष्यों और उत्प्रेरकों से तय होते हैं और जो आपकी सूझ-बूझ के अनुरूप होते हैं, केवल तभी आप अपने सफल होने की सम्भावनाओं को नाटकीय रूप से बढ़ा सकेंगे।

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