4 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
कल्पना कीजिए, एक 9 साल का बच्चा हाथ में छड़ी लेकर, विशालकाय मगरमच्छ को एक बार नहीं, बल्कि 15 बार छड़ी से मारते हुए चिल्ला रहा है, “छोड़ दो।” क्या आपको लगता है कि मगरमच्छ सुनेगा? ज़ाहिर है, नहीं सुनेगा। एक बच्चा मगरमच्छ को ऐसे मारेगा, तो क्या प्रतिक्रिया भी नहीं देगा? इस मामले में तो उसने प्रतिक्रिया नहीं दी क्योंकि उसके मुंह में, उस दिन की भूख के लिए मांस का बड़ा टुकड़ा था।
25 जुलाई, 2025 को, यूपी में आगरा से लगभग 70 किलोमीटर दूर बाह गांव का वीरभान अपनी बकरियों को चराने के लिए बाहर गया। दोपहर 2 बजे, वीरभान और उसके दो बच्चों को प्यास लगी। वह नदी से पानी लेने गया। उसने बेटे को छड़ी देकर बकरियों का ध्यान रखने कहा।
उसके होश उड़ गए, जब एक विशाल मगरमच्छ उसकी ओर बढ़ा और अचानक दाहिना पैर पकड़कर पानी में खींचने लगा। उसका बेटा अजय राज निषाद, जो चौथी कक्षा का छात्र था, बिल्कुल नहीं हिचकिचाया। उसके पास लंबी छड़ी के अलावा कुछ नहीं था, जिससे उसने मगरमच्छ के शरीर पर वार किया, लेकिन कोई असर नहीं हुआ।
कुछ ही सेकंड में उस छोटे से दिमाग ने सोच लिया कि इतने बड़े शिकारी को रोकने के लिए, उसे वहीं मारना होगा जहां सबसे ज्यादा दर्द हो। अजय सीधे मगरमच्छ की आंख पर मारने लेगा। तेज दर्द के कारण उस सरीसृप को अपनी पकड़ छोड़नी पड़ी और वह पीछे हट गया।
अजय की सटीकता और साहस की कहानी, अब उन युवा भारतीयों की बढ़ती विरासत का हिस्सा है, जो समझते हैं कि एक छोटा-सा, सही जगह पर उठाया गया कदम किस्मत बदल सकता है। अजय सेना में शामिल होना चाहता है। इस सूझबूझ के लिए उसे पिछले हफ्ते दिल्ली में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से प्रतिष्ठित प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार मिला।
जान बचाने के लिए “वहीं मारना जहां दर्द होता है” की उसकी समझ, उसके साथ सम्मानित किए गए अन्य बहादुर बच्चों की कहानियों में भी गूंजती है। केरल के मोहम्मद सिदान पी को ही लें। जब उसके दो दोस्त अचानक एक ज़िंदा बिजली के तार की चपेट में आ गए, तो 11 साल का मोहम्मद घबराया नहीं और न ही जानलेवा तार को सीधे छुआ।
उसने बड़ी सटीकता से खतरे के स्रोत पर एक सूखी चीज़ मारकर, अपने दोस्तों को करंट से अलग किया। इलेक्ट्रिकल कनेक्शन पर वहीं वार किया, जहां सबसे ज़्यादा ‘चोट’ लगती है यानी उसने सर्किट को तोड़ा और दो जानें बचा लीं।
साल 2024 की शुरुआत में, महाराष्ट्र के अमरावती की 17 साल की करीना थापा ने एक अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स में लगी भीषण आग के दौरान 70 परिवारों को बचाया। उसने देखा कि एक जलते हुए फ्लैट में, गैस सिलेंडर फंसा है। यह जानते हुए कि एक धमाके से दर्जनों की जान जा सकती है, उसने घने धुएं के बीच भारी सिलेंडर को आग की लपटों से दूर खींचा।
उसकी बहादुरी उस समय सबसे ज़्यादा काम आई, क्योंकि सबसे बड़े खतरे को हटाने पर उसके फोकस ने तबाही को रोक दिया। साल 2010 में, उत्तराखंड का 10 साल का प्रियांशु जोशी अपनी बहन के साथ स्कूल से लौट रहा था, तभी अचानक तेंदुए ने हमला कर दिया।
उसे पता था कि बहन की रक्षा के लिए तुरंत लड़ना होगा। भागने की बजाय उसने अपने भारी स्कूल बैग को हथियार की तरह इस्तेमाल किया और पूरी ताकत से उस तेंदुए पर हमला किया। मुझे नहीं पता कि उसने तेंदुए को कहां मारा, लेकिन शायद वहीं मारा होगा जहां सबसे ज़्यादा चोट लगती है। जानवर पीछे हटने पर मजबूर हो गया, जिससे दोनों की जान बच गई।
फंडा यह है कि हमारे बच्चों के बहादुर कारनामों ने पुरानी कहावत “वहीं मारो जहां सबसे ज़्यादा चोट लगे” को बदलकर “वहीं मारो जहां काम बन जाए” कर दिया है।



