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- Co operation Is The Only Weapon To Fight For Children’s Future N. Raghuraman’s Column
4 घंटे पहले
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एन. रघुरामन मैनेजमेंट गुरु
रविवार सुबह इंदौर स्थित सेज यूनिवर्सिटी परिसर में आयोजित ‘एजुकेशन लीडर्स समिट’ में एक शिक्षक ने सवाल किया कि ‘जब ज्यादातर पैरेंट्स यह सोचते हैं कि बच्चे को अनुशासन सिखाने और पढ़ाने की पूरी जिम्मेदारी स्कूल की है, क्योंकि उन्होंने फीस दी है, तो हमें क्या करना चाहिए?’
उन्होंने कहा बच्चे ज्यादा समय घर पर बिताते हैं, इसके बावजूद माता-पिता सहयोग के बजाय हमसे प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं, जैसे हम उनसे कुछ छीन रहे हों। आज शिक्षकों की स्थिति ठीक उन पैरेंट्स जैसी है, जो महीने का राशन खरीदकर डिपार्टमेंटल स्टोर की कतार में खड़े होते हैं और साथ खड़ा बच्चा बार-बार अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड यानी यूपीएफ उठा कर ट्रॉली में डालता रहता है।
पैरेंटिंग कॉन्फ्रेंस में मैंने कई माता-पिता को कहते सुना है कि ‘जब हम शॉपिंग करने जाते हैं, तो सारी ट्रीट्स और चॉकलेट्स चेकआउट काउंटर के पास ही रखी होती हैं। बच्चा भी लाइन में होता है तो उन्हें उठाकर खरीदने की जिद करता है। अगर हम मना करें तो मुंह फुला लेता है। दूसरों के सामने उसके अनुचित व्यवहार के डर से हमें वह चीज खरीदनी पड़ती है।
मुझे समझ नहीं आता कि डिपार्टमेंटल स्टोर इन्हें चेकआउट एरिया में रखना बंद क्यों नहीं करते? ’यूपीएफ का संकट अब वैश्विक हो चुका है। पिछले महीने यूपीएफ से होने वाले स्वास्थ्य खतरों को लेकर दुनिया की सबसे बड़ी समीक्षा रिपोर्ट ‘लैंसेट’ में प्रकाशित हुई। लैंसेट दुनिया के सबसे पुराने और प्रभावशाली मेडिकल जर्नल्स में से एक है।
यह स्वास्थ्य की बेहतरी और नीतियों पर प्रभाव डालने वाले अत्यधिक असरकारक वैज्ञानिक शोधों को प्रकाशित करता है और दुनियाभर में बेहतर जीवन के लिए चिकित्सा क्षेत्र में हो रही प्रगति को बताता है। इससे शोधकर्ताओं और हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स को मदद मिलती है।
यूनिसेफ तक ने खुलासा किया है कि दुनिया में पहली बार कम वजन वाले बच्चों की तुलना में मोटापे से पीड़ित बच्चों की संख्या ज्यादा हो गई है। एशिया और अफ्रीका महाद्वीपों में निम्न और मध्यम आय वाले देशों तक में जंक फूड बच्चों की डाइट पर हावी हो रहा है। एक हालिया रिपोर्ट में केन्या में बच्चों की गिरती सेहत के का कारण भी जंक फूड को बताया गया।
जैसे शिक्षकों को लगता है कि पूरा एजुकेशन सिस्टम उनके खिलाफ है, एक तरफ मैनेजमेंट और दूसरी तरफ सहयोग न करने वाले पैरेंट्स। वैसे ही पैरेंट्स को भी लगता है कि पूरा फूड सिस्टम उनके विरुद्ध है। समाज को भी यही लगता है कि किसी बच्चे की परवरिश करना धारा के विपरीत तैरने जैसा है।
इस समस्या से निकलने के लिए दुनिया में नया जीवन लाने वाले पैरेंट्स, पैरेंट को नौकरी देकर मुनाफा कमाने वाला उद्यमी और उस बच्चे को भविष्य की सक्षम वर्कफोर्स बनाने वाला शिक्षक- इन तीनों को ही एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा बंद कर आपस में सहयोग शुरू करना होगा। ऐसा सहयोग अब 2026 में कुछ नतीजे दे सकता है। क्योंकि यह पैरेंट्स और शिक्षक, दोनों के साझा दुश्मन के लिए हो रहा है- वह है सोशल मीडिया।
विश्व में पहली बार ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया गया है। कई अन्य देश भी इसकी तैयारी में हैं। दुनिया मान रही है कि प्रतिबंध मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का समाधान है। मलेशिया और न्यूजीलैंड ने भी ऐसे ही प्रस्ताव रखे हैं। इस फैसले से फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसी बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों को अकाउंट बंद करने पड़े हैं।
लेकिन सवाल यह भी उठ रहे हैं कि टेक-सैवी किशोरों पर यह बैन लागू करना कितना व्यावहारिक होगा। मैनेजमेंट की भाषा में एक शब्द है ‘को-ऑपेटिशन’- जो कॉम्पिटिशन और को-ऑपरेशन को जोड़कर बना है। ऐसा पहली बार है कि भावी पीढ़ियों के मानसिक स्वास्थ्य पर तकनीक के अत्यधिक इस्तेमाल के असर को देखते हुए सोशल मीडिया कंपनियां और सरकारें एकजुट हो रही हैं।
फंडा यह है कि यदि हम विरासत में मिली दुनिया को भावी पीढ़ी के लिए और बेहतर छोड़ना चाहते हैं तो इस ग्रह के जिम्मेदार नागरिक के तौर पर हम सभी को एक-दूसरे का सहयोग करना पड़ेगा, भले ही हम पेशेवर तौर पर प्रतिस्पर्धी हों।