17 नवंबर को पिपरेसिवा गांव निवासी नीलम कुशवाह (22) को जेएएच के बर्न यूनिट में लाया गया। वह खाना बनाते समय आग की चपेट में आकर 55% से अधिक झुलस चुकी थी। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि वह गर्भवती थी, लेकिन परिजनों ने यह नहीं बताया था। नीलम के पेट में बच
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इसलिए न्यू जेएएच से अल्ट्रासाउंड मशीन मंगवाकर बेड पर ही जांच कराई। रिपोर्ट देखकर चिंता और बढ़ गई, क्योंकि बच्चे के गले में नाल फंसी थी। इस स्थिति में नॉर्मल डिलीवरी संभव नहीं थी, जबकि इस स्थिति में ऑपरेशन करना जोखिम भरा था।
मैंने, डॉ. श्याम गुप्ता, डॉ. यशोधरा गौर और डॉ. अंजलि जलज से चर्चा की। इसके बाद प्लास्टिक सर्जरी और गायनिक विभाग की संयुक्त टीम बनाई गई। गंभीर हालत को देखते हुए नीलम को केआरएच ले जाया गया, जहां ऑपरेशन के जरिए उसने स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।
आमतौर पर 55% से ज्यादा झुलसे मरीज असहनीय पीड़ा के कारण हिम्मत हार जाते हैं, लेकिन नीलम की अपने बच्चे के प्रति ममता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बनी। उसी जज्बे ने हमें भी हर स्तर पर लड़ने की ताकत दी, और नतीजा यह रहा कि जच्चा-बच्चा दोनों सुरक्षित हैं।
43 दिन तक चला दर्द से संघर्ष, सोमवार को मां-बच्चे की जीत
- नीलम का ब्लड ग्रुप ‘A-1’ था, जो मिलना मुश्किल था, लेकिन हमने उसका भी इंतजाम किया। जूनियर डॉक्टर्स ने अपनी गाड़ी से उसे केआरएच पहुंचाया और सफल सीजेरियन के जरिए एक स्वस्थ बच्चे का जन्म हुआ।
- स्वस्थ बच्चे को जन्म देने के बाद भी नीलम का संघर्ष अभी बाकी था। ऑपरेशन के बाद महिला को दो दिन गायनिक वार्ड में रखा गया और फिर बर्न यूनिट में शिफ्ट किया गया। इसके बाद महिला के शरीर पर दो बड़े ऑपरेशन और किए गए। जिन हिस्सों की त्वचा नहीं जली थी, वहां से खाल लेकर विशेष तकनीक से उसे फैलाया गया और जले हिस्सों पर लगाया गया।
- बच्चे के जन्म के करीब एक सप्ताह बाद उसे मां के पास लाने की अनुमति दी गई, ताकि वह स्तनपान करा सके।
- 43 दिन तक दर्द से संघर्ष और लंबे इलाज के बाद नीलम अब पूरी तरह स्वस्थ हो चुकी है। सोमवार को उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया। यह उसका पहला बच्चा है।



