अंतरराष्ट्रीय खुशी दिवस: फिनलैंड लगातार 9वें साल शीर्ष पर:  147 देशों की सूची में भारत 116वें स्थान पर, बीते साल से दो पायदान की बढ़त; फिर भी चीन, नेपाल और पाक से पीछे

अंतरराष्ट्रीय खुशी दिवस: फिनलैंड लगातार 9वें साल शीर्ष पर: 147 देशों की सूची में भारत 116वें स्थान पर, बीते साल से दो पायदान की बढ़त; फिर भी चीन, नेपाल और पाक से पीछे


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हेलसिंकी57 मिनट पहले

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डिजिटल दुनिया का सबसे गहरा और नकारात्मक असर 15 साल की लड़कियों पर दिख रहा है।- प्रतीकात्मक फोटो

फिनलैंड में एक कहावत है…‘बोलना चांदी है, पर खामोशी सोना है।’ एकांत और शांति पसंद यह देश शायद दुनिया की सबसे खुशहाल जगह न लगे, पर 2026 की ‘वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट’ में फिनलैंड ने लगातार 9वीं बार बाजी मारी है।

रिपोर्ट ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के वेलबीइंग रिसर्च सेंटर ने जारी की है। गैलप व यूएन सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क की स्टडी के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है।

147 देशों की सूची में भारत 116वें स्थान पर है। इसके मुताबिक खुशी घटने की बड़ी वजह आर्थिक असुरक्षा,डिजिटल अकेलापन व सामाजिक सहयोग की कमी है। सोशल मीडिया पर ‘दिखावे की संस्कृति’ असली मानवीय जुड़ाव खत्म कर रही है। अपनों के साथ की कमी मानसिक सुकून को और घटा रही है, भविष्य की अनिश्चितता भी बड़ा कारण है..

तो जानिए खुशी की वजह

टॉप-10 में नॉर्वे, स्वीडन और आइसलैंड जैसे देश हैं। समान संपन्नता, शानदार स्वास्थ्य सेवाएं और मजबूत सरकारी सुरक्षा चक्र। यहां अमीर-गरीब की खाई कम है, जो मंदी जैसे मुश्किल दौर में भी लोगों की मुस्कान बनाए रखती है।

और उदासी का कारण

सबसे चिंताजनक बात यह है की खुशी में गिरावट 25 साल से कम उम्र के युवाओं में सबसे ज्यादा देखी गई है। जहां दुनिया के बाकी हिस्सों में युवा जिंदगी से संतुष्ट हैं, वहीं अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे अमीर देशों के किशोरों की खुशहाली का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है। शोधकर्ता इसके लिए स्मार्टफोन और सोशल मीडिया को जिम्मेदार मानते हैं। लेकिन कहानी इतनी सीधी नहीं है… गैलप में वर्ल्ड न्यूज की मैनेजिंग एडिटर जूली रे कहती हैं, असल समस्या ‘सामाजिक साथ’ की कमी है। जब युवाओं को अपनों से जुड़ाव महसूस नहीं होता, तो वे अकेलेपन को दूर करने के लिए स्क्रीन की शरण लेते हैं। दुर्भाग्य से, सोशल मीडिया की यह डिजिटल निर्भरता उनकी खुशी बढ़ाने के बजाय उदासी को और गहरा कर देती है।

ज्यादा असर टीनएज लड़कियों पर

डिजिटल दुनिया का सबसे गहरा और नकारात्मक असर 15 साल की लड़कियों पर दिख रहा है। जो लड़कियां 5 घंटे से ज्यादा सोशल मीडिया पर बिताती हैं, वे जिंदगी से सबसे कम संतुष्ट हैं। ‘इन्फ्लुएंसर कल्चर’ व ‘परफेक्ट लाइफ’ वाली रील्स देखकर उनमें खुद को कमतर आंकने की भावना और तुलनात्मक तनाव बढ़ रहा है। सोशल मीडिया पर कंटेंट ‘देखना’ उन्हें मानसिक रूप से उदासी व अकेलेपन की ओर धकेल रहा है, जिससे उनकी असली मुस्कान फीकी पड़ रही है।

टॉप-10 खुशहाल देश

रैकिंग में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड में से कोई भी टॉप-10 में नहीं है।

1.फिनलैंड

2. आइसलैंड 3. डेनमार्क

4. कोस्टा रिका 5. स्वीडन

6.नॉर्वे 7. नीदरलैंड्स

8. इजराइल 9. लक्जमबर्ग

10. स्विट्जरलैंड

अब बात भारत में खुशी के स्तर की

ताजा रिपोर्ट में भारत की तस्वीर उम्मीद और चुनौती, दोनों दिखाती है। 2024 (126) और 2025 (118) के मुकाबले लगातार स्थिति सुधर रही है। भारत की इस ‘धीमी लेकिन पक्की’ बढ़त के पीछे मजबूत पारिवारिक संरचना व सामाजिक ताना-बाना है, जो मुश्किल वक्त में सुरक्षा कवच बनता है। हालांकि, हम पड़ोसी देशों चीन (65) नेपाल (99) और पाकिस्तान (104) से पीछे हैं। इप्सॉस के हैप्पीनेस सर्वे में 29 देशों की सूची में भारत 22वें स्थान पर है। बीते साल 7वें पर था। दोनों रिपोर्टों के अनुसार खुशी घटने की सबसे बड़ी वजह ‘आर्थिक असुरक्षा’ व ‘ सोशल मीडिया का दबाव’ है। सोशल मीडिया पर बढ़ती तुलनात्मक भावना भारतीयों के मानसिक सुकून घटा रही है।

युद्ध से जूझ रहे, पर खुशी कम नहीं होने दी: युद्ध के बावजूद इजराइल 5वें स्थान पर है। एक्सपर्ट के मुताबिक इजरायल में ‘सामाजिक एकजुटता’ और ‘पारिवारिक समर्थन’ बहुत मजबूत है, जो संकट के समय मानसिक संबल देता है। युद्ध के बावजूद यूक्रेन (105वें) में ‘साझा उद्देश्य’ की भावना और रूस (72वें) में मध्यम स्थिरता बनी हुई है, जिससे दोनों की रैंकिंग में बहुत बड़ी गिरावट नहीं आई।



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