धूल का गुबार। हवा को चीरते हुए टी-90 भीष्म टैंकों की दहाड़। और उस शोर के बीच, आसमान में राफेल की गड़गड़ाहट… यह कोई हॉलीवुड की वॉर फिल्म का सेट नहीं, बल्कि भारत की पश्चिमी इलाके की अंतर्राष्ट्रीय सीमा के पास चल रहा भारतीय सेना का सबसे बड़ा शक्ति प्रद
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आसमान में ड्रोन ने निगरानी करते हुए सैनिकों को दुश्मन के ठिकानों की जानकारी दी और सैनिकों ने बिना एक पल गंवाए आधुनिक हथियारों के साथ दुश्मन को नष्ट कर दिया। ड्रोन आज के युद्ध की आवश्यकता बन गया है। पाकिस्तान द्वारा ड्रोन अटैक के बाद ड्रोन हमलों की आशंका को देखते हुए आधुनिक ड्रोन की महत्ता बढ़ गई है।
अब भारतीय सेना युद्धाभ्यास में ड्रोन के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही है। ड्रोन सेना को हथियार, रसद व अन्य कई तरह से मादा कर रहे हैं ताकि जान का जोखिम ना हो और तकनीक के इस्तेमाल से दुश्मन को नेस्तोनाबूत किया जा सके।
‘अभ्यास मरु ज्वाला’ में सैनिक दिखा रहे दमखम दरअसल 30 अक्टूबर से थार के रेगिस्तानी सेक्टर में एक अभूतपूर्व सैन्य एक्शन चल रहा है। सदर्न कमांड की सुदर्शन चक्र कोर के तहत, शाहबाज डिवीजन के हजारों गैलेंट सैनिक इस युद्धाभ्यास के सबसे आक्रामक चरण ‘अभ्यास मरु ज्वाला’ को अंजाम दे रहे हैं। पूरे पश्चिमी सेक्टर में एक बिजली सी दौड़ गई है। सीमा के उस पार हलचल है और यहां, रेगिस्तान की रेत अब आग उगलने को तैयार है।
रात का सन्नाटा और डिजिटल अटैक की तैयारी सरहद पर रात… तापमान तेजी से गिर चुका है। लेकिन कमान और नियंत्रण केंद्र में गर्मी है। यहां, युद्ध के पारंपरिक नक्शे अब डिजिटल स्क्रीन में बदल चुके हैं। अधिकारियों की आंखें उपग्रहों, यूएवी (ड्रोन) और रडार से आ रहे रियल-टाइम डेटा पर टिकी हैं। जवान चिल्ला कर कहते हैं – “यह अभ्यास ‘तकनीक की शक्ति से संचालित’ है। अब हम दुश्मन को सिर्फ टैंकों से नहीं, बल्कि डिजिटल डोमेन में घुसकर मारेंगे।”
तभी, स्क्रीन पर दुश्मन के एक काल्पनिक ठिकाने की लोकेशन फ्लैश होती है। कमांड सेंटर से तुरंत आदेश जारी होते हैं। यह ‘नेटवर्क्ड फायर’ का कमाल है— डेटा आया, विश्लेषण हुआ, और हमला तुरंत सक्रिय।

T-90 ‘भीष्म’ की दहाड़— जमीन पर आक्रामक मोर्चा सरहद पर रात के बाद सुबह ‘अभ्यास मरु ज्वाला’ शुरू होता है। सूरज की पहली किरण के साथ, रेगिस्तान की धरती कांपने लगती है।
टी-90 ‘भीष्म’ टैंकों का एक बेड़ा भयंकर गर्जना करते हुए आगे बढ़ता है। ये सिर्फ टैंक नहीं, ये भारत की आक्रामक शक्ति के प्रतीक हैं। धूल के बड़े-बड़े गुबार हवा में उठते हैं, जिससे दुश्मन के लिए छिपना मुश्किल हो जाता है।
सैनिक अपने टैंकों के अंदर हाई-इंटेंसिटी इंटीग्रेटेड मैन्यूवर्स कर रहे हैं— यानी, चलते-चलते सटीक निशाना लगाना और दुश्मन के हमले से बचना। उनके पीछे-पीछे बख्तरबंद वाहनों में पैदल सेना भी आगे बढ़ रही है, जो संयुक्त युद्ध (Jointness) की नई रणनीति का हिस्सा है।
ब्रह्मोस को तैनात किया इस दौरान, भारत की गौरव ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को उसके लॉन्च व्हीकल (TEL) पर तैनात किया गया। ब्रह्मोस की उपस्थिति ही सीमा पर तनाव बढ़ा देती है— यह दुनिया की सबसे तेज क्रूज मिसाइल है, और इसकी तैनाती का मतलब है कि भारत लॉन्ग-रेंज डीप स्ट्राइक के लिए पूरी तरह तैयार है।

आसमान से निगरानी और ड्रोन का राज इस अभ्यास का सबसे खास और नाटकीय तत्व है मानव रहित प्लेटफॉर्म (Unmanned Platforms) यानी ड्रोनों का वर्चस्व। रेतीले टीलों की ओट से, हेरॉन और अन्य स्वदेशी यूएवी उड़कर दुश्मन के काल्पनिक इलाके में घुसपैठ करते हैं। ये ‘आंखें’ बिना किसी सैनिक को जोखिम में डाले, दुश्मन के ठिकानों, जमावड़े और रडार सिग्नल को स्कैन करती हैं।
एंटी-ड्रोन सिस्टम का ट्रायल यूएवी द्वारा भेजी गई थर्मल इमेजिंग और हाई-रिजोल्यूशन तस्वीरें सीधे कमांड सेंटर की डिजिटल स्क्रीन पर आती हैं। यह खुफिया, निगरानी और टोही (ISR) की हाईटेक क्षमता है।
साथ ही, सेना अपनी खुद की सुरक्षा के लिए काउंटर-ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (EW) प्रणालियों का भी ट्रायल कर रही है। ये प्रणालियां दुश्मन के ड्रोनों या संचार को जाम करने (Jam) और उन्हें मार गिराने की क्षमता रखती हैं।
तीनों सेनाओं का ‘डिजिटल त्रिशूल’, स्पेशल फोर्सेज का तालमेल इस अभ्यास की सफलता का मूलमंत्र है ‘संयुक्तता’ (Jointness)। थल सेना अकेले नहीं लड़ रही।अभ्यास के दौरान राफेल और सुखोई-30 MKI जैसे लड़ाकू जेट्स ने बहुत कम ऊंचाई पर उड़ान भरकर क्लोज एयर सपोर्ट दिया। ये जेट्स, जमीनी सैनिकों से सीधे संपर्क में रहकर, दुश्मन के ठिकानों को हवाई हमलों से नष्ट कर रहे थे। थल सेना के पैरा कमांडो, नौसेना के मार्कोस और वायु सेना के गरुड़ कमांडो ने मिलकर अंदरूनी घुसपैठ और टारगेट को नष्ट करने का अभ्यास किया।

सुधार और टेक्नोलॉजी से संचालित यह ‘त्रिशूल’ युद्धाभ्यास सिर्फ गोलीबारी का प्रदर्शन नहीं, बल्कि भारत की रक्षा नीति में बड़े सुधारों का सबूत है। सेना ने खुद को ‘टेक्नोलॉजी एब्जॉर्बशन’ (नई तकनीक अपनाने) के लिए तैयार किया है। इस अभ्यास से सीमा पर तैनात हर सैनिक को यह संदेश मिल गया है कि वह डिजिटल नेटवर्क से जुड़ा है और उसके पीछे तीनों सेनाओं की अखंड शक्ति खड़ी है।
यह महा-अभ्यास 10 नवंबर तक जारी रहेगा, लेकिन इन 5 दिनों ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत की सैन्य ताकत अब ‘कल की’ नहीं, बल्कि ‘आने वाले कल की’ है।
अभ्यास में इस्तेमाल हो रहे हथियार, वाहन और तकनीक ‘त्रिशूल’ युद्धाभ्यास सिर्फ सैनिकों के तालमेल का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह भारत की सैन्य इन्वेंट्री की हाईटेक क्षमता का लाइव ट्रायल है। इस अभ्यास में सदर्न कमांड जिन प्रमुख हथियारों, वाहनों और तकनीकों का उपयोग कर रही है।
इन फोटोज में देखिए युद्धाभ्यास की झलकियां…







रणभूमि के डिजिटल नेत्र: युद्धाभ्यास में इस्तेमाल हो रहे प्रमुख UAV भारतीय सेना, वायु सेना और नौसेना द्वारा ‘त्रिशूल’ जैसे युद्धाभ्यास में खुफिया, निगरानी और टोही (ISR) मिशन के लिए इन मानव रहित प्लेटफार्मों पर बहुत अधिक निर्भरता दिखाई देती है।
| नाम | काम/भूमिका | प्रमुख विशेषताएं |
| हेरॉन मार्क 2 (Heron Mark 2) | लंबी दूरी की उच्च-ऊंचाई वाली निगरानी, टोही और खुफिया जानकारी जुटाना (ISR)। |
उड़ान समय: 30 से 45 घंटे तक लगातार हवा में रह सकता है। ऊँचाई: 35,000 फीट से अधिक की ऊँचाई पर उड़ान भरने में सक्षम। क्षमता: सभी मौसम में काम करने की क्षमता, उपग्रह संचार (सैटेलाइट लिंकेज) के माध्यम से हजारों किलोमीटर दूर से नियंत्रण संभव। |
| हेरॉन टीपी (Heron TP) | हेरॉन का सशस्त्र संस्करण (Armed Drone) जिसे “हंटर-किलर” ड्रोन भी कहा जाता है। | क्षमता: लक्ष्यों को ट्रैक करने के साथ-साथ मिसाइलों से हमला करने में भी सक्षम। (त्रिशूल अभ्यास में इसकी उन्नत निगरानी क्षमताओं का प्रदर्शन किया गया।) |
प्रमुख स्वदेशी यूएवी (Indigenous UAVs) – ‘आत्मनिर्भर भारत’ की शक्ति
‘त्रिशूल’ जैसे अभ्यासों में, भारतीय सेना डीआरडीओ (DRDO) द्वारा विकसित स्वदेशी प्लेटफार्मों का परीक्षण करती है, जो आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है।
| नाम | काम/भूमिका | प्रमुख विशेषताएँ |
| तपस-BH (TAPAS-BH – Tapasya) | भारत का प्रीमियर मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (MALE) UAV प्रोग्राम, जिसे रुस्तम-2 के नाम से जाना जाता था। | उद्देश्य: हेरॉन क्लास की क्षमताओं को स्वदेशी रूप से हासिल करना। क्षमता: 24 घंटे से अधिक उड़ान समय, 30,000 फीट की ऊँचाई तक जाने में सक्षम। यह इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस, सिग्नल इंटेलिजेंस और इमेजरी इंटेलिजेंस के लिए सेंसर ले जा सकता है। |
| नेट्रा (Netra) | छोटी दूरी की निगरानी और टोही के लिए इस्तेमाल होने वाला मिनी-UAV। |
निर्माता: आइडियाफोर्ज (ideaForge), एक भारतीय स्टार्टअप। क्षमता: घनी आबादी वाले क्षेत्रों या युद्ध के मैदान पर ‘लाइन-ऑफ-साइट’ में निगरानी। इसका उपयोग आतंकवाद विरोधी अभियानों और सीमा पर त्वरित जानकारी के लिए किया जाता है। |
| अभ्यास (Abhyas) | हाई-स्पीड एक्सपेंडेबल एरियल टारगेट (HEAT) – यह निगरानी नहीं करता, बल्कि मिसाइलों के परीक्षण के लिए लक्ष्य के रूप में काम करता है। | काम: यह दुश्मन के विमानों या मिसाइलों का अनुकरण करता है, ताकि भारतीय वायु रक्षा मिसाइलें (जैसे आकाश या बराक) इस पर फायर करके अपनी सटीकता का परीक्षण कर सकें। |
‘त्रिशूल’ में UAVs की भूमिका (Digital Warfare)
‘त्रिशूल’ में इन UAVs का उपयोग केवल जासूसी तक सीमित नहीं था। ये ‘नेटवर्क्ड फायर’ (Networked Fires) की नई रणनीति में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं:
- हेरॉन और तपस जैसे ड्रोन दुश्मन के ठिकानों की हाई-डेफिनिशन तस्वीरें और डेटा कैप्चर करते हैं।
- यह डेटा तुरंत एक सुरक्षित डिजिटल नेटवर्क के माध्यम से टी-90 टैंक, ब्रह्मोस मिसाइल बैटरी और कमांड सेंटर के साथ साझा किया जाता है।
- इस रियल-टाइम जानकारी के आधार पर, सेना कुछ ही सेकेंड में हमला करने या अपनी रणनीति बदलने का निर्णय लेती है।
- ड्रोन को आगे भेजकर, सेना दुश्मन की सटीक स्थिति जान लेती है, जिससे सैनिकों को अनावश्यक जोखिम से बचाया जा सकता है।
हेरॉन ने उन्नत विदेशी तकनीक दिखाई, जबकि तपस और नेट्रा जैसे स्वदेशी प्लेटफार्मों ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत भारत की बढ़ती घरेलू क्षमताओं को दर्शाया।
उभयचर वाहन (Amphibious Vehicles)-
वे विशेष प्रकार के वाहन होते हैं जो जमीन और पानी – दोनों पर चल सकते हैं। इनका नाम संस्कृत के शब्द “उभय” (दोनों) और “चर” (चलने वाला) से बना है, यानी – “दो जगह चलने वाला वाहन”।
मुख्य विशेषताएं:
दोहरी क्षमता: ये वाहन सड़क या जमीन पर पहियों या ट्रैक से चलते हैं, और पानी में नाव या बोट की तरह तैर सकते हैं।
जलरोधी संरचना: इनका ढांचा इस तरह बनाया जाता है कि पानी अंदर न जा सके।
विशेष गति प्रणाली: पानी में चलने के लिए इनमें प्रोपेलर (पंखे जैसे ब्लेड) या जेट सिस्टम लगा होता है। प्रकार:
सैन्य उभयचर वाहन: सेना द्वारा उपयोग किए जाने वाले वाहन जो जमीन से समुद्र या नदी पार कर सकते हैं।
उदाहरण: BMP-2 (भारतीय सेना का उभयचर युद्ध वाहन) अमेरिकी सेना का AAVP-7A1
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रेत के धोरों में टैंक गरज रहे हैं। 28 हजार फीट तक की ऊंचाई से लड़ाकू विमानों ने मिसाइलें दागीं। सेना के जांबाज चुन-चुनकर दुश्मन के ठिकानों को नेस्तनाबूद कर रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद तीनों सेनाओं की ये सबसे बड़ी एक्सरसाइज है। पढ़िए पूरी खबर
2. पाकिस्तान बॉर्डर पर आज से गरजेगा ‘त्रिशूल’:भारत की तीनों सेनाओं का सबसे बड़ा संयुक्त युद्धाभ्यास शुरू, पाकिस्तान में नोटम

पाकिस्तान से सटी भारत की पश्चिमी सीमा पर युद्ध जैसे हालात का अभ्यास करने के लिए भारतीय सशस्त्र सेनाओं ने गुरुवार 30 अक्टूबर से 11 नवंबर तक 13 दिवसीय मेगा युद्धाभ्यास ‘त्रिशूल’ शुरू कर दिया है। पढ़ें पूरी खबर



