ग्वालियर में बनता है उच्च गुणवत्ता का तिरंगा:  9 मानकों पर खरा उतरने के बाद 55 दिन की मेहनत से लेता है आकार – Gwalior News

ग्वालियर में बनता है उच्च गुणवत्ता का तिरंगा: 9 मानकों पर खरा उतरने के बाद 55 दिन की मेहनत से लेता है आकार – Gwalior News




भारत में राष्ट्रीय ध्वज दो ही स्थानों पर उच्च मानकों के साथ तैयार किया जाता है। इनमें से एक ग्वालियर स्थित मध्य भारत खादी संघ है, जबकि दूसरा संस्थान कर्नाटक के बेंगिरी गांव में है। ग्वालियर का मध्य भारत खादी संघ ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (BIS) द्वारा ISI प्रमाणित भारतीय तिरंगा बनाता है। यह संस्थान देश के उन चुनिंदा केंद्रों में से एक है, जहां राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण के लिए निर्धारित कड़े मानकों का पालन किया जाता है। राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण की प्रक्रिया कई चरणों से होकर गुजरती है। कपास की कताई, बुनाई और डाई सहित कुल 9 मानकों पर खरा उतरने के बाद ही तिरंगा झंडा अपना अंतिम आकार लेता है। धागे से लेकर तैयार झंडे तक के इस सफर में कई कारीगरों और बुनकरों की कला के साथ-साथ लगभग 55 दिनों की कड़ी मेहनत लगती है। यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि प्रत्येक झंडा उच्चतम गुणवत्ता और निर्धारित विशिष्टताओं के अनुरूप हो। उल्लेखनीय है कि दिल्ली के लाल किले पर भी ग्वालियर में महिला-पुरुष कारीगरों द्वारा निर्मित झंडा फहराया जा चुका है, जो इसकी गुणवत्ता और विश्वसनीयता का प्रमाण है। ग्वालियर शहर से 16 राज्यों में भेजते हैं झंडा मध्य भारत खादी संघ की वर्कशॉप ग्वालियर के जीवाजी गंज में स्थित है। जहां स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस से कुछ महीनों पहले से कारीगर दिन-रात काम में जुटे रहते हैं ताकि देशभर से आने वाली मांग की पूर्ति की जा सके। देशभर में फहराए जाने वाले राष्ट्रीय ध्वज में से 40 प्रतिशत ग्वालियर में बनाए जाते हैं। यहां से देश के 16 राज्यों में झंडा बनकर भेजा जाता है। राष्ट्रध्वज बनने की पूरी प्रक्रिया को जानने
दैनिक भास्कर की टीम वर्कशॉप में पहुंची। यहां एक बड़े से हॉल में 15 से 16 महिला और पुरुष कारीगर झंडा बनाने में व्यस्त थे। कोई झंडे की सिलाई कर रहा था तो कोई उसकी नपाई। महिलाएं झंडों की सिलाई करने में व्यस्त थीं। एक दिन में उन्हें लगभग 650 झंडे सिलने होते हैं। तिरंगे झंडे की हाथ से सिलाई करती बुजुर्ग महिला सीसल वुड की रस्सी से फहराया जाता है। झंडा सिल रहीं महिला रानी सावंत ने बताया कि वह पांच साल से सिर्फ झंडे ही सिल रही हैं। 26 जनवरी और 15 अगस्त के वक्त काम बढ़ जाता है। जहां झंडों की सिलाई का काम चल रहा था, वहीं पास में धीरेंद्र जमीन पर बैठकर झंडे को साधने वाली रस्सी गूंथ रहा था। हमें बताया गया कि जिस रस्सी से झंडा साधा जाता है वह आम नहीं होती। सीसल वुड से यह रस्सी बनती है। इसके पास ही लैब में झंडों की फाइनल टेस्टिंग की जा रही थी। पास ही एक कमरा था जहां तैयार झंडे रखे हुए थे। लैब की इंचार्ज नीलू मैकले ने बताया कि सबसे पहले झंडों की नपाई और उसके बाद झंडे को फोल्ड करने का भी नियम होता है। केसरिया रंग अंदर आता है और हरा रंग ऊपर आता है। झंडे को बांधने वाली रस्सी और लकड़ी की गुल्ली भी खास होती है। झंडे में लगने वाली रस्सी सीसल वुड की होती है। यह देश में कम ही पाई जाती है। यह रस्सी पहले विदेश से मंगाई जाती थी, पर अब पश्चिम बंगाल में ही मिल जाती है। यह 495 रुपए किलो मिलती है। कर्नाटक और मध्यप्रदेश में ही बनता है राष्ट्रीय ध्वज
तिरंगा बनाने का काम देश में तीन स्थानों महाराष्ट्र के मुंबई, कर्नाटक के हुबली और मध्यप्रदेश के ग्वालियर में किया जाता था, लेकिन अब महाराष्ट्र में झंडे नहीं बनते हैं। फिलहाल हुबली और ग्वालियर में ही झंडे बनाने का काम हो रहा है। ग्वालियर के मध्य भारत खादी संघ में बने झंडों की डिमांड 16 से 17 राज्यों में है।यही कारण है कि देश के 40 प्रतिशत झंडे यहीं से सप्लाई होते हैं। इसके लिए खादी संघ ने नई मशीनें लगाई हैं। जहां लैबोरेटरी में टेस्ट करके 9 मानकों के आधार पर झंडे बनाकर सप्लाई किए जाते हैं। फिलहाल सालाना एक से सवा करोड़ रुपए के झंडे ग्वालियर में ही तैयार हो रहे हैं। तीन साइज के बनाए जाते हैं राष्ट्रीय ध्वज
मध्य भारत खादी संघ में BIS (ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड) प्रमाणित तीन साइज के तिरंगे तैयार किए जाते हैं। जिनमें 2 बाई 3, 6 बाई 4, और 3 बाई 4.5 फीट के झंडे शामिल हैं। राष्ट्रीय ध्वज बनाने के लिए मानकों का ख्याल रखना होता है, जिसमें कपड़े की क्वालिटी, रंग और चक्र का साइज बहुत जरूरी है। उसके बाद खादी संघ में इन सभी चीजों का टेस्ट किया जाता है। इस साल 60 से 70 लाख रुपए के झंडे के ऑर्डर आ चुके हैं।मध्य भारत खादी संघ के मंत्री रमाकांत शर्मा ने बताया इन राज्यों में जाते हैं तैयार किया तिरंगे झंडे
ग्वालियर में बने झंडे 16 से 17 राज्यों में जाते हैं। यहां तक कि लालकिले पर भी ग्वालियर में बना झंडा फहराया जा चुका है। ग्वालियर में बना झंडा मध्यप्रदेश के अलावा उत्तरप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, छत्तीसगढ़, बिहार, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, ओडिशा, अंडमान निकोबार सहित देश की एम्बेसी सहित अन्य शासकीय व अर्द्ध शासकीय संस्थाओं में जाता है। सन 1925 में चरखा केंद्र से शुरू हुई थी तिरंगा बनाने की यात्रा
ग्वालियर में स्थित इस केंद्र की स्थापना साल 1925 में चरखा संघ के तौर पर हुई थी। साल 1956 में मध्य भारत खादी संघ को आयोग का दर्जा मिला। इस संस्था से मध्य भारत की कई प्रमुख राजनीतिक हस्तियां भी जुड़ी हैं। उनका मानना है कि किसी भी खादी संघ के लिए तिरंगे तैयार करना बड़ी मुश्किल का काम होता है, क्योंकि सरकार की अपनी गाइडलाइन है उसी के अनुसार तिरंगे तैयार करने होते हैं। यही कारण है कि जब यहां तिरंगे तैयार किए जाते हैं तो बारीकी से उनकी मॉनिटरिंग की जाती है। कड़े परीक्षण और कई दौर की जांच के बाद 2016 में मध्य भारत खादी संघ को BIS से तिरंगा बनाने की अनुमति मिली थी, जिसके बाद अब ग्वालियर देश का दूसरा सबसे बड़ा झंडा निर्माण केंद्र बन गया है। खादी केंद्र इकाई का टर्नओवर पिछले साल लगभग 4.18 करोड़ रुपए हुआ था। वहीं डिमांड बढ़ने के बाद 1 अप्रैल 2025 से 15 अगस्त 2025 की अवधि के दौरान इसका व्यापार बढ़कर 99 लाख रुपए हो गया है। इस दौरान संघ ने 26 हजार से ज्यादा झंडे बनाकर सप्लाई किए हैं। इस साल 26 जनवरी पर मध्य भारत खादी संघ के पास 1.30 करोड़ लाख रुपए के झंडे के ऑर्डर आ चुके हैं।



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