जैसलमेर की मरुधरा की जीवनरेखा कहे जाने वाले ‘ओरण’ (पवित्र देववन) के अस्तित्व को बचाने के लिए अब तक का सबसे बड़ा जन-आंदोलन शुरू हो गया है। तनोट राय माता मंदिर से शुरू हुई 725 किलोमीटर लंबी ‘ओरण बचाओ पदयात्रा’ शुक्रवार को रामगढ़ पहुंची। यहां ग्रामीणों ने फूल बरसाकर पर्यावरण प्रेमियों का स्वागत किया। पर्यावरण प्रेमी सुमेर सिंह बोले- यह यात्रा महज एक पैदल मार्च नहीं, बल्कि 25 हजार ओरणों के हक की लड़ाई है जो अब सीधे प्रदेश की राजधानी जयपुर की चौखट पर दस्तक देगी। दरअसल, प्रशासन द्वारा तीन महीने के आश्वासन के बाद भी ओरण को रेवेन्यू रिकॉर्ड में दर्ज नहीं करने पर पर्यावरण प्रेमी खासे नाराज है। अब पदयात्रा निकालकर जयपुर कूच कर रहे हैं और वहां राजधानी में जाकर धरना लगाकर सरकार को जगाने का प्रयास करेंगे। क्यों सुलग रही है आंदोलन की आग? पर्यावरण प्रेमी सुमेर सिंह ने बताया – इस महासंग्राम की नींव प्रशासन की उस वादाखिलाफी पर टिकी है, जो पिछले साल 34 दिनों तक चले धरने के बाद दी गई थी। टीम ओरण के सुमेरसिंह सावंता ने तीखे शब्दों में कहा, “प्रशासन ने हमसे तीन महीने का समय मांगा था, जिसकी मियाद 19 जनवरी को खत्म हो चुकी है। जब वादे फाइलों में दब गए, तो हमने सड़क पर उतरने का फैसला किया। अब फैसला जयपुर के ऐतिहासिक धरने में ही होगा।” मुंहबोली ओरण बनाम सरकारी रिकॉर्ड: 17 हजार बीघा का भविष्य अधर में पर्यावरण प्रेमी भोपालसिंह झालोड़ा ने बताया कि राजस्थान में लगभग 25 हजार ओरणें हैं, जो लाखों हेक्टेयर में फैली हैं। विडंबना यह है कि इनमें से अधिकांश ‘मुंहबोली’ हैं, यानी सदियों से समाज इन्हें पूज रहा है, लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में इनका नामोनिशान नहीं है। इसका फायदा उठाकर इन जमीनों पर अतिक्रमण और औद्योगिक कब्जे का खतरा मंडरा रहा है। वर्तमान में 17,562 बीघा जमीन के प्रस्ताव सरकार के पास लंबित हैं, जिनमें प्रमुख ओरण शामिल हैं: रामगढ़ में संकल्प: ‘जब तक हक नहीं, तब तक वापसी नहीं’ शुक्रवार को रामगढ़ में आयोजित महासभा में सैकड़ों लोगों ने एक सुर में ओरण-गोचर बचाने का संकल्प लिया। सभा के बाद जब पदयात्रा रवाना हुई, तो जनसैलाब उमड़ पड़ा। यह यात्रा अगले 30 दिनों तक विभिन्न गांवों और कस्बों से गुजरेगी। पदयात्रियों का लक्ष्य स्पष्ट है—जयपुर पहुंचकर अनिश्चितकालीन धरना शुरू करना और सरकार को इन पवित्र जमीनों को ‘ओरण’ के रूप में राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करने के लिए मजबूर करना। परंपरा बनाम विकास का टकराव पश्चिमी राजस्थान में ओरण न केवल वन्यजीवों और मवेशियों का आसरा हैं, बल्कि लोक संस्कृति का केंद्र भी हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि रिकॉर्ड में दर्ज न होने के कारण इन जमीनों पर सौर ऊर्जा और अन्य परियोजनाओं के नाम पर प्रकृति का दोहन किया जा रहा है। “हमारी मांग केवल जमीन की नहीं, हमारी आस्था और विरासत की है,” यह नारा पूरी यात्रा के दौरान गूंज रहा है।
Source link
ओरण बचाने 725KM पदयात्रा पर निकले पर्यावरण प्रेमी: रामगढ़ में हुआ स्वागत; रिकॉर्ड में दर्ज कराने के लिए 30 दिन में पहुंचेंगे जयपुर – Jaisalmer News
- Share



