शेखर गुप्ता का कॉलम:  यह सुधारों को तेज करने का अवसर है

शेखर गुप्ता का कॉलम: यह सुधारों को तेज करने का अवसर है


5 घंटे पहले

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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

मेरा एक मन यह कहना चाहता है कि ‘शुक्रिया मिस्टर ट्रम्प, जो आप भारत के साथ व्यापार समझौते पर लगातार टालमटोली कर रहे हैं!’ क्योंकि आप ऐसा न करते तो यहां महत्वपूर्ण आर्थिक सुधार फटाफट न किए जाते, जैसा 1991 के बाद अब तक नहीं हुआ था। उदाहरण के लिए नए श्रम नियमों को ही ले लीजिए।

सरकार ने इससे पहले नया भूमि अधिग्रहण विधेयक, कृषि कानून, सबको वापस ले लिया था और जोखिम से बचने के लिए श्रम कानूनों को ठंडे बस्ते में डाल रखा था। आर्थिक प्रशासन, मसलन सरकारी बैंकों की बैलेंस शीटों की सफाई, उनकी मजबूती और दिवालिया कानून आदि के मामले में कुछ सुधार जरूर किए गए। लेकिन इस बीच ‘सरकार ही माई-बाप’ वाला संरक्षणवाद फिर लौट आया। टैरिफ में वृद्धि हुई और क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर के रूप में भारी-भरकम नॉन-टैरिफ सुरक्षा दीवार खड़ी कर दी गई। भारतीय उद्योग के हर सेक्टर ने इनके लिए पैरवी की और इन्हें हासिल कर लिया।

तेजतर्रार भारतीय सिविल सेवाओं को मिलाकर बनी अंदरूनी मंडली ने ही इन्हें तैयार किया होगा। ट्रम्प शायद भारत की इन्हीं नॉन-टैरिफ बाधाओं का जिक्र कर रहे थे। दरअसल, इनका समय बीत चुका है। इन्हें अब हड़बड़ी से नहीं, तो मुस्तैदी से वापस किया जा रहा है। अनुभवी और भरोसेमंद अधिकारी इस वापसी परियोजना को आगे बढ़ा रहे हैं। भगवान उन्हें और शक्ति दे!

लेकिन, ट्रम्प साहब आपका फिर से शुक्रिया। शुक्रिया नरमी नहीं, बल्कि ऐसा अहंकार दिखाने के लिए कि आपने एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक संबंध को सिर्फ इस हठ के लिए खराब कर लिया कि किसी ने आपको फोन किया था या नहीं! ट्रम्प न होते तो व्यापार से मुंह मोड़ने वाले हमारे सत्तातंत्र को ट्रेड डील के जादू का पता न चला होता।

अब तो ब्रिटेन और ‘यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन’ (ईएफटीए) के साथ व्यापार समझौता भी झोली में आ चुका है और ईयू के साथ भी समझौता होने वाला है। चीन को छोड़ (उसके लिए भी प्रतिबंधों को हटाया जा रहा है) ‘आरसीईपी’ (क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी) का लगभग हर सदस्य देश साथ आ गया है। इसके बाद व्यापार को लेकर भारत का दिमाग भी बदल गया है। इसलिए मिस्टर ट्रम्प, आपको फिर से धन्यवाद!

किसी भी कम सीधे और कम आक्रामक कदम से अपनी पीठ खुद ठोकते रहने वाला हमारा सत्तातंत्र सुकून की नींद लेने लगता। 7% की आर्थिक वृद्धि के साथ नगण्य मुद्रास्फीति दर, इसके साथ हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद और जनकल्याण की कार्यकुशल डिलीवरी का मेल जबरदस्त चुनावी फॉर्मूला तो तैयार कर ही देता है। फिर अपनी नाव को जोखिम में क्यों डालें? लेकिन ट्रम्प ने हमें याद दिलाया कि बच-बच के खेलना कोई विकल्प नहीं है। इसलिए स्कोर बढ़ाओ, चाहे जो जोखिम हो!

यह तो उम्मीद की ही जा रही थी कि ट्रम्प व्यापार को अपनी नीति का औजार बनाएंगे। लेकिन भारत यह अनुमान नहीं लगा पाया कि वे टैरिफ को हथियार के रूप में इस्तेमाल करेंगे। वैसे, सच कहें तो बाकी दुनिया भी यह अनुमान नहीं लगा पाई। भारत सबसे ज्यादा आत्मतुष्ट और व्यापार के प्रति उदासीन था और यह मान बैठा था कि ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में आपसी संबंध रणनीतिक हितों से संचालित होते रहेंगे।

लेकिन इसके विपरीत यह रणनीतिक पहलू हमारे लिए तब पलट गया, जब ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान व्हाइट हाउस में वापस पहुंच गया। मोदी और ट्रम्प के बीच सद्भावना का जो भी थोड़ा-सा पानी बचा था, वह ‘मेरा नोबेल पुरस्कार कहां है?’ की गरमी में भाप बनकर उड़ गया।

भारत उनके नाम की सिफारिश तो नहीं ही कर सकता था लेकिन हम पाकिस्तानियों को सबक सिखाते, इससे पहले ही उन्हें होश में लाने और युद्धविराम की राह बनाने के लिए ट्रम्प को धन्यवाद कहने पर विचार तो किया ही जा सकता था। इससे इनकार करना रणनीतिक भूल थी।

मेरा दूसरा मन इस बात को कबूल करता है कि यह जो संकट जारी है, वह कम वेतन वाले लाखों रोजगारों को किस तरह खत्म कर रहा है और बड़े पैमाने पर रोजगार देने वाले मछली पालन, गारमेंट्स, होजियरी, रत्न और ज्वेलरी जैसे क्षेत्रों को नुकसान पहुंचा रहा है। अब तक ये क्षेत्र कुछ तो सरकार की मदद से और कुछ अपनी अब तक की रफ्तार के बूते बचे रहे हैं। लेकिन तीन महीने और बीतने के बाद इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर छंटनी हो सकती है। इसलिए भारत इसे लंबे समय तक नहीं झेल सकता। समाधान ढूंढने पड़ेंगे।

इसका मतलब यह नहीं है कि भारत ट्रम्प के सामने गिड़गिड़ाए, जिसकी अपेक्षा वे जिनपिंग और पुतिन को छोड़ दुनिया के हर नेता से रखते हैं। लेकिन भारत उन कई मामलों में ज्यादा लचीला रुख अपना सकता है, जो ट्रम्प के लिए काफी संवेदनशील हैं। उदाहरण के लिए, उनकी फार्म लॉबी। मैं जानता हूं कि भारत में इसका स्वाभाविक विरोध इस डर के कारण होता है कि यह भारतीय कृषि का सफाया कर देगा या यहां उन ‘जीएम’ उत्पादों की बाढ़ ला देगा, जिन पर भारत ने रोक लगा रखी है (जिसे मैं लंबे समय से अनुचित मानता रहा हूं)।

आक्रामक हुए बिना भी रास्ता निकाला जा सकता है। जरा देखिए कि ढाका में अमेरिकी दूतावास वहां मात्र 58,000 टन मक्के की आमद पर कितना खुश है। यह मुर्गियों का चारा है। भारत भी मुख्यतः मुर्गियों के लिए ही चारे का आयात करता है। केवल इथेनॉल बनाने या चारे के लिए मक्का आयात करने में क्या दिक्कत है? अब यह मत कहिए कि हम अपनी मुर्गियों को ‘जीएम’ वाला चारा नहीं खिला सकते। ‘जीएम’ कपास की भूसी हमारी मवेशियों का प्रमुख चारा है। और इससे निकाला जा रहा तेल हमारी ‘फूड चेन’ में 23 वर्षों से मौजूद है।

पूरी दुनिया ट्रम्प से निबटने के उपाय तलाश रही है। अब तक तो आप उनके तौर-तरीके और शैली को समझ ही चुके होंगे। बिना प्रचार किए उन्हें कुछ अहानिकर जीत का श्रेय लेने दिया जा सकता है। कुछ शोर हो सकता है और टक्कर भी हो सकती है, जैसी इंदिरा और निक्सन के बीच हुई थी। लेकिन वह दूसरा दौर था।

तब शीतयुद्ध चरम पर था। आज दुनिया बदली हुई है और यह नया भारत है। आज भारत आर्थिक और रणनीतिक रूप से अमेरिका तथा वैश्विक व्यवस्था से बहुत जुड़ चुका है। ऐसे में ठोस आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाइए, क्योंकि ऐसा संकट पीढ़ियों के बीच एकाध बार ही आता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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