एन. रघुरामन का कॉलम:  किसी पाने वाले को देने वाला बनाते हैं तो खुशी दोगुनी हो जाती है

एन. रघुरामन का कॉलम: किसी पाने वाले को देने वाला बनाते हैं तो खुशी दोगुनी हो जाती है


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4 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

जीवन की खुशी अकसर तब दोगुनी हो जाती है, जब कोई पाने वाला देने वाला बन जाता है। इसका सबसे पहला अनुभव हम पैरेंटहुड में देखते हैं। जब आप पहली बार अपने बच्चे को कोई ट्रीट देते हैं और इसे ग्रैंड पैरेंट्स, पड़ोसी या फिर किसी बेघर जानवर के साथ शेयर करने को कहते हैं तो कुछ बदल-सा जाता है।

बच्चे की खुशी महज उस चीज को लेकर नहीं होती, बल्कि अचानक से आई क्षमता की समझ को लेकर होती है। उनके नन्हे दिमाग में सशक्त होने का ख्याल दौड़ता है कि ‘मैं बड़ा हो गया हूं। अब मैं सिर्फ लेने वाला नहीं बचा। दे भी सकता हूं।’ यह छोटा-सा कदम ऐसी सकारात्मक भावनाएं जगाता है, जो लोगों के बीच दूरी को पाट देता है और आनंद के एकाकी अनुभव को सामूहिक जुड़ाव में बदल देता है।

क्रिसमस की पूर्व संध्या पर बुधवार को एक स्कूल के एनुअल फंक्शन में मैंने ऐसे गहरे आनंद का अनुभव किया। ‘फेस्टिवल्स ऑफ इंडिया’ नाम के थीम सॉन्ग पर जैसे-जैसे संगीत आगे बढ़ा, दर्शकों ने देखा कि कैसे भारत में मकर संक्रांति से उत्सव शुरू होते हैं और लगभग हर महीने एक-दो त्योहार आते हैं।

ही संगीत अपने क्लाइमैक्स की ओर बढ़ा, स्टेज पर सांता क्लॉज आए। लेकिन ऐसे सांता मैंने पहले कभी नहीं देखे थे। वे व्हीलचेयर पर आए। शुरुआत में, मेरी तरह पीछे बैठे सैकड़ों लोगों ने भी सोचा कि यह कोई क्रिएटिव थिएट्रिकल प्रयोग होगा।

कद में छोटे-से सांता की दाढ़ी चिर-परिचित थी, लेकिन जज्बा बहुत बड़ा था। पहली कतार में बैठे हुए मैंने देखा कि उनका कमर से ऊपर का शरीर डांस कर रहा था। पैर स्थिर थे, लेकिन हाथ बेहद शालीनता से हिल रहे थे। अपना बैग खाली होने तक वे मिठाइयां और गिफ्ट बांटते रहे।

उस देने वाले के चेहरे पर पूर्ण आजादी का भाव था। कुछ दे सकने के भाव में जैसे वो अपने पैरालिसिस को भूल ही गया हो। यह ‘सांता’ इंदौर के एनी बीसेंट स्कूल में चौथी कक्षा की 9 वर्षीय छात्रा तनिष्का सोनी थीं। पहली कक्षा में स्पाइनल नर्व इंजरी के चलते पैरालाइज्ड हुईं तनिष्का को कक्षा के भीतर और बाहर कोई भी काम करने के लिए सहपाठियों और माता-पिता की मदद लेनी पड़ती है।

शारीरिक जरूरत के चलते वे सालों से एक ‘रिसीवर’ बनी रहीं। अब स्कूल के कोरियोग्राफर्स ने बीते तीन वर्षों से हर एनुअल फंक्शन में उनके लिए एक किरदार शामिल कर लिया, ताकि वे जीवन की खूबसूरत रिदम में सक्रिय बनी रहें। खुद तनिष्का भी स्कूल की हर एक्टिविटी में शामिल होने की मांग करती रही थीं।

जैसे ही तनिष्का ने वो गिफ्ट बांटे, एक बदलाव पूर्ण हो गया। आमतौर पर जिस बच्ची की व्हीलचेयर को दूसरे लोग खिसकाते हैं, वो आज सारे ऑडियंस को अपनी खुशी के संसार में खींच रही थी। दाढ़ी की वजह से आंखों और गालों तक ही दिख पा रहा उसका चेहरा चमक रहा था।

यह ऐसी सच्चाई बता रहा था, जिसे हम अकसर नजरअंदाज करते हैं कि असली समृद्धि शारीरिक क्षमता और भौतिक संपत्ति में नहीं, बल्कि यह तो वो अवस्था है- जिसमें भावनात्मक स्थिरता और योगदान देने की इच्छाशक्ति है।

देने वाले की भूमिका में आकर तनिष्का ने साबित किया कि जब शरीर बंधा हो तो भावना से दूसरों को कुछ दिया जा सकता है। तनिष्का ने याद दिलाया कि हम जो संसाधन दे सकते हैं, वो हमारे बैग में नहीं होते। बल्कि ये वो क्षमता और रोशनी है, जो हम अपने दिल से बांट सकते हैं।

तनिष्का सोनी की कहानी इंसानी जज्बे की एक मजबूत गवाही है। दूसरों की मदद के लिए हम अकसर ‘परफेक्ट कंडीशंस’ का इंतजार करते रहते हैं- थोड़ा और पैसा हो जाए, सेहत और बेहतर हो जाए या थोड़ा वक्त और मिल जाए। लेकिन तनिष्का हमें सिखाती है कि आप जहां हो, वहीं से ही और अपनी शेष ताकत से ही दे सकते हैं।

फंडा यह है कि जब हम किसी को उसकी सीमाएं देखे बिना कुछ देने का मौका देते हैं तो हम उसकी अहमियत और क्षमता की भावना को री-स्टोर कर देते हैं।

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