अमेरिका में लगातार तीसरी बार ब्याज दरों में कटौती:  3.50%-3.75% के बीच रहेंगी, लोन सस्ते होंगे; भारत जैसे देशों में विदेशी निवेश बढ़ सकता है

अमेरिका में लगातार तीसरी बार ब्याज दरों में कटौती: 3.50%-3.75% के बीच रहेंगी, लोन सस्ते होंगे; भारत जैसे देशों में विदेशी निवेश बढ़ सकता है


वॉशिंगटन7 मिनट पहले

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अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर में 25 बेसिस पॉइंट्स (0.25%) की कटौती की है। अब ये 3.50% से 3.75% के बीच आ गई है। इससे पहले फेड ने 29 अक्टूबर को भी 0.25% की कटौती की थी, जिससे ये 3.75% से 4.00% के बीच थी। फेड ने यह कदम मुख्य रूप से लेबर मार्केट में नरमी और बढ़ी हुई महंगाई के कारण उठाया है।

ये लगातार तीसरा मौका है जब फेड ने ब्याज दरों में कटौती की है। इससे पहले 17 सितंबर और 29 अक्टूबर को ब्याज दरों में कुल 0.50% की कटौती हुई थी। तब ब्याज दरें 4% – 4.25% और 3.75% – 4% के बीच आ गई थीं। फेडरल ओपन मार्केट कमेटी ने इस कटौती के पक्ष में 9- 3 से वोट किया।

पिछले साल तीन बार घटाई थी ब्याज दर

पिछले साल फेड ने लगातार तीन बार- दिसंबर में 0.25%, नवंबर में 0.50% और सितंबर में 0.25% की कटौती की थी। तब से रेट्स 4.25% से 4.50% के बीच थे। सितंबर 2024 की कटौती करीब 4 साल बाद की गई थी।

फेड ने मार्च 2020 के बाद सितंबर 2024 में इंटरेस्ट रेट्स घटाए थे। महंगाई कंट्रोल करने के लिए सेंट्रल बैंक ने मार्च 2022 से जुलाई 2023 के बीच 11 बार ब्याज दरों में इजाफा किया था।

दरों में कटौती से भारत में निवेश बढ़ सकता है

बाजार विश्लेषकों का कहना है कि यह कटौती अमेरिकी शेयर बाजारों के लिए सकारात्मक है, क्योंकि इससे उधार लेना सस्ता हो जाएगा और कंपनियां ज्यादा निवेश कर सकेंगी। भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए भी यह अच्छी खबर हो सकती है, क्योंकि अमेरिकी दरों में कमी से विदेशी निवेश बढ़ सकता है।

फेड की मीटिंग में मतभेद के बीच कटौती

फेड की इस डिसीजन को अक्टूबर वाली मीटिंग जितना ही कंट्रोवर्शियल बताया जा रहा है। अक्टूबर में भी रेट कट हुई थी, लेकिन वहां डिसेंट वोट्स दोनों तरफ से आए थे। एक तरफ रीजनल बैंक के प्रेसिडेंट्स महंगाई के रिस्क की वजह से ज्यादा सख्त पॉलिसी चाहते थे, वहीं बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के मेंबर्स जॉब मार्केट की कमजोरी पर चिंतित थे।

इस बार भी वैसा ही हुआ। फेड चेयर जेरोम पॉवेल ने कहा कि आगे की कटौती तभी होगी जब लेबर मार्केट में मटेरियल डिटिरियरेशन दिखे। सितंबर के आखिरी डेटा के मुताबिक, अनएम्प्लॉयमेंट रेट 4.4% पर पहुंच गया था और कोर PCE इन्फ्लेशन 2% टारगेट से ऊपर 2.8% पर था। लेकिन नवंबर के जॉब्स और इन्फ्लेशन रिपोर्ट अभी शटडाउन की वजह से लेट हैं। ये रिपोर्ट फेड मीटिंग के कुछ दिनों बाद आएंगी, जो पॉलिसी को शेप देंगी।

महंगाई को काबू करने का मजबूत हथियार है पॉलिसी रेट

सेंट्रल बैंक के पास पॉलिसी रेट नाम का एक मजबूत हथियार है, जिससे वो महंगाई पर लगाम लगा सकता है। जब महंगाई बहुत बढ़ जाती है, तो सेंट्रल बैंक (भारत में RBI) पॉलिसी रेट बढ़ा देता है ताकि बाजार में पैसों का बहाव कम हो जाए।

जब पॉलिसी रेट बढ़ता है, तो बैंकों को सेंट्रल बैंक से कर्ज लेना महंगा पड़ता है। नतीजा ये कि बैंक अपने ग्राहकों को भी महंगे लोन देते हैं। इससे बाजार में पैसे कम घूमते हैं, सामान की मांग घटती है और महंगाई नीचे आती है।

वहीं, जब अर्थव्यवस्था मुश्किल दौर में होती है और उसे उबारने की जरूरत पड़ती है, तो सेंट्रल बैंक पॉलिसी रेट कम कर देता है। इससे बैंकों को सस्ता कर्ज मिलता है और वो ग्राहकों को भी सस्ते लोन देते हैं। इस तरह बाजार में पैसे का बहाव बढ़ता है और अर्थव्यवस्था को रफ्तार मिलती है।

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