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- Priyadarshan’s Column: “‘Shaurya’ Is About Fearlessness, Not Violence Or Sabotage”
1 घंटे पहले
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प्रियदर्शन लेखक और पत्रकार
राजस्थान सरकार के शिक्षा विभाग ने बीते दिनों आदेश जारी किया था कि 6 दिसंबर को राज्य के स्कूलों में “शौर्य दिवस’ मनाया जाए। हालांकि बाद में यह आदेश वापस ले लिया गया। कहा गया कि बच्चों के इम्तिहान चल रहे हैं, इसलिए “शौर्य दिवस’ समारोह मनाने का फैसला टाला जा रहा है।
लेकिन राजस्थान सरकार को 6 दिसंबर “शौर्य दिवस’ क्यों लगता है? क्या इसलिए कि उस दिन बाबरी मस्जिद गिराई गई थी? अगर हां तो पूछा जा सकता है कि उस ध्वंस में शौर्य जैसा क्या था? 6 दिसंबर को अयोध्या में जो कुछ हुआ, वह एक आपराधिक कृत्य था- यह बात किसी और ने नहीं, स्वयं देश के सर्वोच्च न्यायालय ने कही है।
वैसे बहुत दूर तक इस ध्वंस के लिए जिम्मेदार भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी 6 दिसंबर को अपने जीवन का सबसे हताशा भरा दिन बताया था। बेशक, उन्होंने इसके लिए केंद्र के रवैये को जिम्मेदार ठहराया था, लेकिन 6 दिसंबर 1992 जिस तरह घटित हुआ, उसे वे अपनी रणनीति और राजनीति के लिए उपयुक्त नहीं मानते थे।
लेकिन इस ध्वंस से भाजपा ने कोई सबक सीखा हो, यह नजर नहीं आया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद तो समारोही भव्यताओं के प्रदर्शन का सिलसिला जारी है। यही वह अतिरेक और उल्लास है, जो राजस्थान सरकार के शिक्षा मंत्रालय को प्रेरित करता है कि वह इस दिन को “शौर्य दिवस’ की तरह मनाए। लेकिन 400 से ज्यादा साल पुरानी एक मस्जिद को कारसेवा के नाम पर जुटी भीड़ ने उद्धत ढंग से जिस तरह गिराया, क्या उसे शौर्य का काम कहा जा सकता है?
जबकि उस ध्वंस से पहले तक वहां मौजूद संगठन और नेता वादा कर रहे थे कि बाबरी मस्जिद को क्षति नहीं पहुंचाई जाएगी और तब उत्तर प्रदेश में सरकार चला रहे मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने भी सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र देकर कहा था कि वे विवादित ढांचे की रक्षा करेंगे।
लेकिन तमाम वादे धरे के धरे रह गए, पुलिस देखती रही, सुरक्षा के नाम पर तैनात अर्द्धसैनिक बल किसी आदेश का इंतजार करते रहे, नेता लाउडस्पीकर पर कार्यकर्ताओं से पीछे हटने को कहते रहे, और सबकी निगाहों के सामने एक बेबस मस्जिद के गुम्बद एक-एक कर ढहा दिए गए।
यह बात बाद में सामने आई कि कारसेवकों के नाम पर जुटी भीड़ का एक समूह कुछ दिनों से इस अभ्यास में लगा था कि मस्जिद के गुम्बद कैसे गिराए जाएंगे। क्या वादाखिलाफी और धोखे के दम पर एकतरफा बल-प्रदर्शन के साथ अंजाम दिए गए इस कृत्य को ही राजस्थान सरकार ‘शौर्य’ की संज्ञा दे रही है?
शौर्य एक बड़ा शब्द है। इसका वास्ता तोड़फोड़ और हिंसा से नहीं है। इसका वास्ता निर्भीकता से है- अन्याय करने से नहीं, अन्याय के सामने खड़े होने से है। लेकिन यहां तो जैसे एक ऐतिहासिक अन्याय के सामने अट्टहास लगाने का शौर्य है, जो इस तरह की मानसिकता में प्रदर्शित हो रहा है।
यहां यह गौरतलब है कि आजादी की लड़ाई के दौरान हिंदू-मुस्लिम एकता की बात होती थी, साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई चलती थी, गांधी राम की बात करते थे, राम राज्य की भी बात करते थे। लेकिन राम मंदिर का किसी को खयाल नहीं आया था। बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद एक स्थानीय अदालत में था, जिसके दोनों पक्षकारों के बारे में कहते थे कि वे एक ही रिक्शे पर बैठकर मुकदमा लड़ने जाया करते थे।
सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में भले यह जगह मंदिर को दे दी, लेकिन सरकार से कहा कि वह पांच एकड़ जमीन बाबरी मस्जिद के लिए भी दे। कुछ लोगों को यह मरहम भी मंजूर नहीं है। उन्होंने जैसे आक्रांता भूमिकाएं बदल लेने का फैसला किया है। कल अगर बाबर आक्रांता था तो आज आक्रांता कौन हैं?
लेकिन हिंदुस्तान अगर किसी साझा तहजीब का दम भरता है, अगर विविधता को अपना मूल्य मानता है तो उसे ऐसे नकली और नफरती शौर्य प्रदर्शन को अस्वीकार करना होगा।
400 से भी ज्यादा साल पुराने विवादित ढांचे को भीड़ ने जिस उद्धत ढंग से गिराया था, क्या उसे “शौर्य’ का काम कहा जा सकता है? जबकि उस ध्वंस से पहले तक वहां मौजूद संगठन और नेता वादा कर रहे थे कि बाबरी मस्जिद को क्षति नहीं पहुंचाई जाएगी। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



