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- Pt. Vijayshankar Mehta’s Column Learn The Formula To Remain Comfortable In A Competitive World
3 घंटे पहले
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पं. विजयशंकर मेहता
पिछले वर्षों के मुकाबले पढ़े-लिखे लोगों और योग्य व्यक्तियों की संख्या बढ़ी है। जाहिर है प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी। लेकिन अब प्रतिस्पर्धा, प्रतिद्वंद्विता और इससे भी आगे बढ़कर युद्ध में बदल गई है। अब लोग अपने प्रतिस्पर्धी को तनाव, चिंता और अपमान देने के नए-नए तरीके ईजाद कर चुके हैं।
कई बार तो यदि प्रतिस्पर्धी कमजोर है तो वो तनावग्रस्त होकर, चिंता में डूबकर, अपमान से आहत होकर आत्महत्या तक करने की सोचता है। यह भी हिंसा है। किस युग में प्रतिस्पर्धा नहीं रही? चाहे अवतारों का युग हो या साधु-संतों का समय, सबको अपने दौर में चुनौतियां मिलीं। लेकिन उनके जो तरीके थे, वो आजमाए जाने चाहिए।
वो सिखा गए कि सामने वाले की योग्यता पर ध्यान दो। उसके निर्णयों की पूरी जानकारी और उसकी कमजोरियों पर नजर रखो। और यदि आप अपने प्रतिस्पर्धी के प्रहार से आहत हो रहे हों तो एक प्रयोग प्रतिदिन करिए। सांस लें तो ताजगी और सहजता भीतर उतारें और सांस छोड़ें तो दूसरों के द्वारा दी गई निगेटिविटी को बाहर फेंकें। यह प्रयोग आपको प्रतिस्पर्धी दुनिया में सहज बनाएगा।



