हमारे परिवारों में देखते ही देखते हम लोगों ने विभेद खड़े कर दिए। परिवार में सब समान होते हैं, ये विचार ही नई सोच की आंधी में उड़ गया। निज-हित की अति ने परिवार में कलह, विघटन को आमंत्रण दे दिया। बड़े-छोटे का झंझट अहंकार को पोषित कर रहा है और अहंकार परिवारों का सबसे बड़ा दुश्मन है। अब परिवारों में रिवर्स मेंटरिंग का समय आ गया है। बड़े, छोटों से सीखें और छोटे, बड़ों को आदर दें- इस लेनदेन पर बड़ी गहराई से काम करना होगा। राजनीतिक दृश्य में जैसे नागरिक और मतदाता अलग-अलग नजर आते हैं, हालांकि नेता लोग मानते नहीं हैं। जो लाभ मतदाता को दिया जाता है, वो नागरिकों को नहीं मिलता। जैसे घरों में बहू नागरिक की तरह होती है और बेटी मतदाता की तरह। आप परिवार में छोटे हों या बड़े, लेकिन जब भी कोई निर्णय लें, गतिविधि करें, तो केवल परिवार के सदस्यों को ना देखें- समूचे परिवार को और उसका भविष्य देखें। कामकाज की दुनिया में प्रोफाइल वैल्यू, ह्यूमन वैल्यू से ऊंची बन गई, लेकिन कम से कम घरों में यह न हो।
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