राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के साथ छह अन्य नेताओं के भाजपा में जाने के बाद आम आदमी पार्टी (आप) के भीतर मची उथल-पुथल भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जन्मी इस पार्टी के पतन की शुरुआत भर ही नहीं है। यह मध्यम वर्ग के उस सपने के टूटने जैसा भी है, जिसमें वह अमीरों और बाहुबलियों से सत्ता छीन कर राजनीति को चंद लोगों के स्वार्थ के बजाय व्यापक सामाजिक हित का साधन बनाना चाहता था। राज्यसभा में राघव ‘आप’ के चमकते सितारे बन गए थे। यह उस जुड़ाव को बताता है, जो उनकी पूर्व पार्टी का कभी भारतीय मध्यम वर्ग के साथ था। ऐसा वर्ग, जो उस वक्त की राजनीति से ऊब चुका था और कुछ नया व सार्थक करना चाहता था। जिस पार्टी की राघव 13 साल तक आलोचना करते रहे, अब उसी में चले जाना दिखाता है कि आज की राजनीति कितनी खोखली हो चुकी है, जिसमें आदर्श और निष्ठा को निजी स्वार्थ और अति-महत्वाकांक्षा की बलि चढ़ा दिया जाता है। लेकिन अकेले राघव को दोष क्यों दें? आखिरकार, वह तो अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी में उस वक्त हुई गड़बड़ियों का प्रतीक मात्र है, जब ‘आप’ ने भाजपा और कांग्रेस जैसे बड़े दलों को हरा कर दिल्ली की राजनीति में कदम रखा था। डिलीवरी, पारदर्शिता और हिस्सेदारी चाहने वाले मध्यम वर्ग के दम पर आई ‘आप’ और केजरीवाल ने लोगों को शासन के केन्द्र में रखने का वादा किया था। केजरीवाल का वित्तीय मॉडल पारंपरिक दलों के जैसे कॉरपोरेट फंडिंग पर आधारित नहीं था। उन्होंने लाखों उन समर्थकों के छोटे-छोटे चंदे पर भरोसा किया, जो नई तरह की राजनीति का सपना देख रहे थे। उन्होंने मोहल्ला समूहों के जरिए शिक्षा, स्वास्थ्य और जनभागीदारी वाले लोकतंत्र की बात की। भ्रष्टाचार मुक्त सरकार और जवाबदेह नौकरशाही का वादा किया। यह याद दिलाता है कि गिरावट कितनी जल्दी आ जाती है। यह सही है कि उपराज्यपाल से तनातनी के चलते केजरीवाल के सामने बाधाएं आती रहीं, लेकिन खुद केजरीवाल भी सत्ता और उसके प्रलोभनों से बच नहीं पाए। सादगी से सरकारी फ्लैट में रहने के वादे के बावजूद उन्होंने अपने लिए विशाल बंगला बनवाया। राजधानी में पार्टी को मजबूती देने से पहले ही केजरीवाल की महत्वाकांक्षाएं दिल्ली के परे चली गई थीं। वे हरियाणा, पंजाब से लेकर गुजरात और गोवा तक नजरें दौड़ाने लगे। उनकी बढ़ती महत्वाकांक्षाओं का दोहरा असर दिखा। उनके पुराने और भरोसेमंद साथी बीच राह ही उनसे अलग हो गए। योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, शाजिया इल्मी, अल्का लांबा, कुमार विश्वास और कपिल मिश्रा जैसे कई नाम दिमाग में आते हैं। फिर, पार्टी को फैलाने के लिए केजरीवाल को संसाधनों की भी जरूरत थी। योगदान आधारित जो वित्तीय मॉडल और कार्यकर्ता दिल्ली फतेह करने में उनके काम आए, वो बड़े राज्यों में तेज विस्तार के लिए पर्याप्त नहीं थे। फिर केजरीवाल और उनके करीबी सलाहकारों के खिलाफ ईडी और सीबीआई की जांच शुरू हो गई। 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले केजरीवाल समेत बहुत-से पार्टी नेताओं को जेल भेज दिया गया। हालांकि एक भी आरोप साबित नहीं हुआ और सीबीआई का मामला निचली अदालत ने खारिज कर दिया। लेकिन, इस शोर–शराबे में 2025 की चुनावी हार लगभग तय हो गई थी। ‘आप’ के दिल्ली में और केजरीवाल के अपनी ही सीट पर हारने के बाद जो मौजूदा पलायन दिख रहा है, वह भी होना ही था। केजरीवाल, चड्ढा और ‘आप’ की कहानी याद दिलातीहै आज की राजनीति में क्या खामियां आ गई हैं। यह उन मध्यमवर्गीय आदर्शवादियों के लिए भी एक चेतावनी है, जो सत्ता को एक व्यक्ति के दबदबे, धनबल और बाहुबल से हटा कर जनता की सेवा पर आधारित करना चाहते हैं- जहां मानव विकास और आधुनिक प्रगति को बराबर का महत्व मिले। केजरीवाल और उनकी पार्टी का सियासी तौर पर अंत मान लेना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन राज्यसभा में पार्टी का पतन दिल्ली में एक ऐसा सिलसिला शुरू कर सकता है, जिसका असर शायद पंजाब में भी दिखे। अगले साल ‘आप’ सरकार को वहां अगली चुनावी परीक्षा देनी है। ‘आप’ का अंदरूनी बिखराव उन चुनौतियों को भी रेखांकित करता है, जिनसे उन छोटे दलों को जूझना पड़ेगा, जो सियासत में बदलाव की उम्मीद रखते हैं। ‘आप’ की कहानी याद दिलाती है आज की राजनीति में क्या खामियां आ गई हैं। यह उन आदर्शवादियों के लिए भी चेतावनी है, जो सत्ता को एक व्यक्ति के दबदबे, धनबल और बाहुबल के बजाय सेवा पर आधारित करना चाहते हैं
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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