अनजाने में विवाद हम बढ़ाते, दोष औरों को देते हैं: दूसरों को बदलने की जिद छोड़ें, अपने भीतर की ‘कर्कशता’ को पहचानें: एक्सपर्ट




‘विवाद किसी के साथ भी हो…जीवन साथी, परिजन, दोस्त या सहकर्मी… अक्सर यही लगता कि झगड़े की वजह सामने वाला है। लेखक जेफरसन फिशर कहते हैं, ‘हम सब कभी न कभी ‘मुश्किल इंसान’ होते हैं।’ चुनौती इसे स्वीकारने में नहीं, बल्कि खुद को पहचानने में है। एक्सपर्ट के मुताबिक कुछ संकेत बताते हैं कि आप अनजाने में विवाद बढ़ा रहे हैं। इन्हें समझना जरूरी है, ताकि बातचीत मुद्दे पर रहे, आरोपों पर नहीं। कैसे पहचान सकते हैं इन संकेतों को, जानिए… असली मुद्दे से भटकना जीवनसाथी से बहस में ‘हमेशा’ या ‘कभी नहीं’ जैसे शब्दों का प्रयोग बातचीत को पटरी से उतार देता है। फिशर के अनुसार, ये शब्द असली मुद्दे को दबाकर पुरानी बातों की ‘टाइमलाइन’ खोल देते हैं। थेरेपिस्ट अताली अब्रामोविची कहती हैं कि ऐसे कड़े शब्द सामने वाले को रक्षात्मक बना देते हैं। आरोप लगाने के बजाय खास घटना या तथ्य पर फोकस रखें। विवाद बढ़ने के बजाय सुलझता है। पहचान पर हमला बहस के दौरान ‘तुम आलसी हो’ जैसे जुमले पहचान पर हमले होते हैं। अताली कहती हैं,‘पहचान पर चोट पहुंचने से व्यक्ति जुड़ने के बजाय विमुख हो जाता है। दोष मढ़ने के बजाय भावनाएं व्यक्त करें, जैसे- जब तुमने मेरी बात काटी, मुझे बुरा लगा।’ भावनाओं पर कोई बहस नहीं कर सकता। हिसाब-किताब रखना आप भी याद रखते हैं कि पिछली दिवाली पर किसके घर गए थे या बिजली का बिल किसने भरा था? फिशर कहते हैं,‘रिश्तों को अकाउंटिंग जैसे चलाना इसे बोझिल बना देता है। हिसाब रखकर हम खुद को कमतर महसूस करते हैं। लक्ष्य ‘सही साबित होना’ नहीं, ‘एक टीम’ बनना होना चाहिए। व्यवहार में कठोरता मनोवैज्ञानिक हैरियट लर्नर कहती हैं,‘दोस्त आपको पार्टी में बुलाने से पहले सोचते हैं या घरवाले बात करने से पहले शब्दों को तौलते हैं, तो समझ लें कि वे आपकी प्रतिक्रिया को लेकर डरे हुए रहते हैं। यह संकेत है कि आपके व्यवहार में कठोरता आ गई है।’ अलग मानक फिशर एक टेस्ट बताते हैं। आप लेट होते हैं तो वजह रहती है- ट्रैफिक था। काम था। पर कोई और लेट हुआ तो आपने उसे लापरवाह माना, तो यह दोहरा मानक है। हम अपने व्यवहार को तर्कसंगत करते हैं। दूसरों के उसी व्यवहार को जज करते हैं। यह बहस में भी होता है। अपने तीखे टोन को ‘मूड’ कहकर टाल देते हैं। कोई और कहे तो बुरा मानते हैं। बचाव की मुद्रा बचाव की मुद्रा जुड़ाव खत्म करती है। आलोचना सुनकर तुरंत ‘लेकिन’ कहने के बजाय, सामने वाले की सुनें। आप 2% भी सहमत हों, तो उतनी जिम्मेदारी लेकर माफी मांगें। पहले उन्हें सुनें, सफाई बाद में दें।’



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