प्रियदर्शन का कॉलम:  ईरान ने अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ी और फिलहाल जीती है

प्रियदर्शन का कॉलम: ईरान ने अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ी और फिलहाल जीती है


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8 घंटे पहले

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प्रियदर्शन लेखक और पत्रकार

एक रात में पूरी ईरानी सभ्यता नष्ट करने की चेतावनी देने वाले डोनाल्ड ट्रम्प को फिलहाल पांव पीछे खींचने पड़े हैं। हालांकि वह युद्धोन्मादी और अमानवीय किस्म की घोषणा ही बता रही थी कि असल में ट्रम्प एक नष्ट हो रही सभ्यता की पैदाइश हैं।

वे उस नई बनती दुनिया के नुमाइंदे हैं, जिसमें नफरत, गाली-गलौज, संदेह और उत्पीड़न लगातार स्वीकृत मूल्य बनते जा रहे हैं। ईरान की या दुनिया की तमाम सभ्यताएं ट्रम्प के घातक हमलों से नहीं, उन जैसे नेताओं के चुनाव से ही नष्ट होती हैं।

इसी से एक डरावना सवाल सिर उठाता है। क्या सत्ता का मूल चरित्र वही होता है, जो ट्रम्प के हिंसक और अहंकारी वक्तव्यों से सामने आया है? ईरान की सभ्यता को नष्ट कर देने की बात कहने से पहले उन्होंने भद्दी गालियां देते हुए उसे डराने की भी कोशिश की थी। क्या यह अमेरिका की शक्ति से पैदा हुआ गुमान है कि वे हर किसी को नष्ट कर देने की सोचते हैं?

इसमें संदेह नहीं कि सभ्यता में शक्ति की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पुराने साम्राज्य ताकत के बल पर ही बड़े हुए हैं। बड़े सम्राटों की वीरता की विरुदावलियां गाई गई हैं। वीरता को आभूषण बताया गया है। मगर इसी सभ्यता ने सिखाया है कि वीर होना हिंसक होना नहीं है। वीरता अन्याय करने में नहीं, अन्याय का प्रतिकार करने में है। शक्तिशाली होना युद्धपिपासु होना नहीं है।

ट्रम्प के तेवरों से बेखौफ ईरान की जनता ने यही साबित किया है। अमेरिका और इजराइल ने ईरान की समूची नेतृत्व-पंक्ति को ध्वस्त कर दिया- एक-एक कर सबको मारते चले गए, लेकिन युद्ध जीत नहीं पाए। क्योंकि ईरान जिस सभ्यता का नाम है, वह नेताओं से नहीं, एक स्मृति से बनती है।

देश अपनी स्मृतियों से ही बनते हैं। स्मृतियां अलग होती हैं तो देश अलग होते जाते हैं। ट्रम्प की सेना ने इमारतों को मलबों में बदल दिया, तेल कुओं में आग लगा दी, पुलों को उड़ा दिया, शहरों को तहस-नहस कर डाला, लेकिन वह उस स्मृति को नष्ट नहीं कर सकी, जिससे ईरान बनता है। उल्टे इस अमानुषिक बलप्रयोग ने ईरान की स्मृति जगा दी- वहां वे मानव शृंखलाएं बनने लगीं, जिन्हें भरोसा था कि जब कुछ नहीं टिकेगा तो उनका प्रतिरोध काम आएगा।

जिसे ट्रम्प नष्ट करने चले थे, उसे वे पहचानते तक नहीं हैं। जब अमेरिका नहीं था, तब भी ईरान था, उसका दर्शन और उसकी कविता थी। फारस की खाड़ी से निकली कहानियां दुनिया भर में कही-सुनी जाती रहीं। वहां बीते हजार साल में फिरदौसी, सादी, उमर खय्याम, निजामी, हाफिज, रूमी जैसे कवि और दार्शनिक हुए हैं।

वहीं से वह सूफी परम्परा निकली है, जो एशिया के कई मुल्कों को छूती हुई भारत तक आई है और हमारी आत्मा का हिस्सा बनी हुई है। काइरॉस्तामी, मखमलबाफ और माजिद मजीदी जैसे कई फिल्मकारों ने दुनिया भर में ईरानी सिनेमा की श्रेष्ठता का लोहा मनवाया है।

बेशक, आधुनिक ईरान के अपने संकट और संघर्ष रहे हैं। चाहे शाह रजा पहलवी का दौर हो या फिर खुमैनी-खामनेई का- उनके अंतर्विरोधों ने जनता को सड़कों पर उतरने को मजबूर किया है, वहां की जनता अपने हुक्मरानों के खिलाफ यह संघर्ष करती भी रही थी। लेकिन एक पराये मुल्क के अतार्किक हमले ने जैसे सबको जोड़-सा दिया। यह हमला ईरान की अस्मिता पर हमला बन गया- यह बात ट्रम्प की मुनाफाखोर-तेललोलुप दृष्टि समझ नहीं पाई।

ईरान ने इसी अस्मिता की लड़ाई लड़ी और फिलहाल जीती है। ईरान का सबक यह है कि स्मृतियों पर हमले नहीं होने चाहिए- चाहे वे बाहर से हों या भीतर से, उन्हें मिटाने, बदलने और बिगाड़ने का काम नहीं होना चाहिए- क्योंकि अंततः उन्हीं से अस्मिता बनती है, उन्हीं से एक स्वाभाविक राष्ट्रीय अभिमान बनता है, जिसके आगे ‘मागा’ या ‘अमेरिका फर्स्ट’ जैसी कृत्रिम और नस्लवाद की नफरत से पोसी गई अति-राष्ट्रवादी मुद्राएं हारने को अभिशप्त होती हैं।

अब यह अमेरिकी जनता का कर्तव्य है कि वह ट्रम्प को सभ्यता का मतलब सिखाए और अमेरिका की सभ्यता का सम्मान बचाए रखे। फिलहाल तो ट्रम्प ने अमेरिकी वर्चस्ववाद के अंत की शुरुआत कर दी है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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