नंदितेश निलय का कॉलम:  एआई की तेज गति से कदम नहीं मिला पा रहे हैं हमारे कानून

नंदितेश निलय का कॉलम: एआई की तेज गति से कदम नहीं मिला पा रहे हैं हमारे कानून




हाल ही में कुछ ऐसी घटनाएं घटी हैं, जिन्होंने इस बहस को फिर से सुर्खियों में ला दिया है कि क्या फैसले लेने की प्रक्रिया में नैतिकता और कानून को अलग रखा जा सकता है या वे दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं? एआई कंपनी एंथ्रोपिक के मॉडल्स का इस्तेमाल हथियारों को ऑटोनोमस ढंग से दागने के लिए किया जा सकता है। हालांकि एंथ्रोपिक का मानना ​​है कि ऐसा नहीं किया जाना चाहिए और युद्ध में इसके प्रयोग से बचना चाहिए। वहीं दूसरी ओर पेंटागन- जिसने इस एआई कंपनी को डेटा पर काम करने का कॉन्ट्रैक्ट दिया था- का मानना ​​है कि ऐसा किया जाना चाहिए और उन मॉडल्स का इस्तेमाल युद्ध में होना चाहिए। इस फैसले का जब एंथ्रोपिक ने विरोध किया और ट्रम्प की बात नहीं मानी तो उसे बहिष्कृत कर दिया गया। उसे चीनी टेक दिग्गज हुआवेई की तरह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा वाली श्रेणी में डालने की धमकी भी दी गई। बाद में ट्रम्प ने तर्क दिया कि कानून ही तय करेगा अमेरिका युद्ध कैसे लड़ेगा, न कि किसी कंपनी के नैतिक सिद्धांत। यानी कानून अपने फैसले लेने की प्रक्रिया में बिजनेस एथिक्स की उपेक्षा आसानी से कर सकता है। लेकिन आखिर कानून भी तो समाज के उस अंतिम नागरिक के हितों की रक्षा ही करता है और उसका स्वरूप नैतिकता से बंधा होता है। इधर भारत में हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि नैतिकता और कानून को अलग-अलग रखना होगा। कोर्ट ने माना कि अगर कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता तो नागरिकों के अधिकारों को लेकर कोर्ट के फैसले नैतिकता या सामाजिक सहमति से प्रभावित नहीं होंगे। लेकिन क्या कोई कानून नैतिकता से भिन्न है? अगर कानून न्याय के मूल्यों को स्थापित करने की प्रक्रिया है तो नैतिकता को इससे कैसे अलग रख सकते हैं? आज डेटा से जुड़े नैतिक मुद्दे दुनिया की बड़ी चिंताओं में हैं। किसी भी मुल्क के कानून आम नागरिक की डेटा प्राइवेसी की रक्षा करने के लिए होते हैं। लेकिन एआई के तेजी से बढ़ने, बड़े पैमाने पर डेटा इकट्ठा करने के तरीकों, लगातार उल्लंघनों, रेगुलेटरी बंटवारे और लोगों के बढ़ते भरोसे की वजह से यह चिंता और बढ़ती जा रही है। एआई के युग में फैसले लेने का मुख्य स्रोत डेटा ही है, लेकिन इसका प्रयोग अक्सर प्राइवेसी, ऑटोनॉमी, निष्पक्षता और भेदभाव न करने जैसे बुनियादी अधिकारों से टकराता रहा है, जो नैतिकता और कानून के पृथक होने के प्रश्न को और गहराता है। आज आप अपने फोन के वेब ब्राउज़र या किसी एप में कुछ भी टाइप करते हैं तो अगले ही पल वह डेटा आपके स्क्रीन पर सूचनाओं की लंबी शृंखला रच देता है। आपको लगता है कि जो आप सोच रहे हैं, तकनीकी भी वही ढूंढ रही होती है। लेकिन कंपनियां अकसर बिना किसी सूचना और सहमति के पर्सनल डेटा इकट्ठा करती हैं और उसमें लोकेशन, ब्राउजिंग हिस्ट्री, बायोमेट्रिक्स, आवाज, भावनाएं, सोशल कनेक्शन- सबकुछ शामिल है। क्या कानून या नैतिकता के आधार पर यह सही है? एंथ्रोपिक वाली घटना का एक नैतिक पहलू यह भी है कि कानून बनाने वाले ही तय करते हैं कि तकनीक का विकास या प्रसार कितना और कैसे होगा। लेकिन लगता है जैसे कानून अभी भी एआई के विकास की द्रुत गति से काफी पीछे है। इसलिए किसी भी प्रजातंत्र में जब तक वोटर इस मामले पर कोई फैसला नहीं ले लेते, तब तक नैतिकता की जिम्मेदारी कानून बनाने वालों और उनका इस्तेमाल करने वालों, दोनों को मिलकर उठानी होगी। एंथ्रोपिक का केस हो या डेटा से जुड़े नैतिक मुद्दे, कानून के साथ-साथ वह “मोरल-कम्पास’ तो उन फैसलों की रूह में होना ही चाहिए, जो पूरे मानव समाज को प्रभावित करते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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